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Sunday, November 13, 2022

प्यारे बच्चों के नाम, धरती का पैगाम



प्यारे बच्चों… 

आज बाल दिवस पर तुम सभी को मेरी दिल से बहुत सारी शुभकामनाएं। मेरी हार्दिक इच्छा है कि तुम सब मेरे आंचल की हरियाली में खूब खेलो। मेरी साफ-सुथरी नदियों में खूब नहाओ, पानी पीओ। मेरे समंदर की सैर करो। मेरे पहाड़ों की ऊंचाईयां नापो। लेकिन मेरे बच्चों, ये केवल मेरी इच्छा भर है। मुझे इस बात का बहुत अफसोस है कि मैं चाहकर भी ये सब तुम्हें नहीं दे सकती। आज तुम्हारे जैसे ही बहुत से बच्चों ने बड़े होकर मुझे दुख दिया है। मेरी नदियों में कीचड़, गंदगी, रसायन, जहर भर दिया है। मेरी हरियाली काटकर रेगिस्तान बनाते जा रहे हैं। इससे बढ़ रही गर्मी से मेरे पहाड़ों की बर्फ पिघल रही है। सब कुछ खत्म होता जा रहा है। लेकिन, मुझे तुम सबसे बहुत उम्मीदें हैं। 



मेरे बच्चों, आज का दिन केवल बाल दिवस मनाने भर का नहीं है। आज तुम सब स्कूल से जगह-जगह टूर पर जाओगे। खूब खेलोगे, कूदोगे, मस्ती करोगे। बहुत अच्छी बात है। क्या तुम मेरी एक बात मानोगे। पूरा दिन मस्ती कर जब शाम को घर पहुंचो तो जरा सोचना। आज दिन में तुम्हें कितनी जगह हरियाली नजर आई। कितनी जगहों पर साफ नदियां, स्वच्छ तालाब या हरी-भरी पहाड़ियां दिखीं। नहीं ना। क्या तुम नहीं चाहोगे कि ये सब वापस आए। मुझे अब तुमसे ही उम्मीदें हैं। तुम सब कल को बड़े हो जाओगे। कोई नौकरी करेगा, कोई व्यापार करेगा। कोई नेता बनेगा, तो कोई अधिकारी। कोई पुलिस में जाएगा तो कोई काले कोट पहनकर अदालतों में दलील देगा।


लेकिन तब भी तुम सब को और तुम्हारे प्यारे बच्चों को भी साफ पानी, साफ हवा तो चाहिए ही होगी। क्या तुम्हें नहीं लगता कि इसके लिए तुम्हें अभी से कोशिश करनी चाहिए। अपनी धरती मां को बचाने के लिए तुम क्या कुछ नहीं करोगे। मुझे ज्यादा कुछ नहीं चाहिए। तुममे से हरएक अगर थोड़ी सी कोशिश भी करेगा तो मैं स्वस्थ्य हो जाऊंगी। अगर मैं सेहतमंद रही तो तुममे से हरएक खुश, स्वस्थ्य और सफल होगा। तो वादा करो कि आज से तुम सब अपनी धरती मां को बचाने के लिए सोचना शुरू करोगे। इसके लिए मैं एक कहानी बताती हूं। अपनी कहानी। इससे तुम्हें मेरे बारे में जानने, समझने का मौका भी मिलेगा और अच्छा भी लगेगा। 




मैं धरती हूं। अरबों साल पुरानी। कभी मैं गर्म गैसों का गोला हुआ करती थी। धीरे-धीरे मैं ठंडी हुई और अपनी गोद में बेहद छोटे अमीबा जैसे जीवों को जीवन लाते हुए देखा। लाखों साल में ऐसे जीवों की संख्या बढ़ती गई और न दिखने वाले असंख्य जीवों के साथ विशालकाय डायनासौर भी मेरी गोद में पले-बढ़े। फिर अचानक एक समय आया जब मुझ पर आसमान से आग के गोले बरसने लगे। मेरा आंचल जल उठा और मेरी गोद में खेलने वाले करोड़ों जीव, जंतु जलकर खाक हो गए। लेकिन जीवन खत्म नहीं हुआ। 


धीरे-धीरे मेरी गोद फिर जीवों से भर गई। इस बार इंसान भी मेरी गोद में खेलने लगे। इन्हें सबसे समझदार, बुद्धिमान बताया गया। मैं भी खुश हो गई कि ये अपने साथ मुझे भी खुश रखेंगे। हजारों, लाखों साल ऐसा ही चला। फिर धीरे-धीरे इंसान विकास करने लगे। वे प्रकृति के साथ रहने के बजाय प्रकृति का दोहन, शोषण करने में जुट गए। इससे जैसे-जैसे इंसान अपनी सभ्यता को विकसित करते गए, उनका मुझपर दबाव बढ़ता गया। 



मेरे हरे-भरे जंगल कटने लगे। मेरी साफ-सुथरी, शीशे जैसी साफ पानी वाली नदियां फैक्ट्रियों की गंदगी से धुंधली दिखने लगीं। शहरों में लगे कारखानों से मेरी जीवन देने वाली हवा में बदबू आने लगी। लोगों को सांस लेने में भी दिक्कत होने लगी। मेरे विशाल समुद्र भी इंसानों के बनाए कचरे से गंदे होने लगे। मैं चाहकर भी अपने बच्चों के लिए कुछ न कर सकी। क्योंकि यह तो उनके अपने ही कामों का परिणाम था। 


पर दो साल पहले कुछ ऐसा हुआ कि मेरी नदियां अचानक साफ होने लगीं। कुछ समय के लिए मेरे जंगलों के कटने की संख्या कम हो गई। मेरी हवा साफ और स्वच्छ हो गई। इससे इंसानों और खासकर उनके बच्चों को एक बार फिर खुली हवा में सांस लेने का मौका मिला। वे दूर तक फैले पहाड़ों, उनपर फैली बर्फ को सैकड़ों किलोमीटर दूर से फिर देख पाने लगे। हजारों, लाखों साल बाद मैं फिर से खुश हो गई। लेकिन बाद में मुझे पता चला कि ऐसा एक बीमारी के फैलने की वजह से हुआ। इस बीमारी को और ज्यादा बढ़ने से रोकने के लिए इंसानों को दुनिया के तमाम देशों में लॉकडाउन लगाना पड़ा। इसी वजह से तमाम कारखाने, काम बंद करने पड़े। इस जानकारी के मिलने से मेरी खुशी थोड़ी कम हो गई। कौन मां चाहेगी कि वह किसी बीमारी के फैलने से खुश हो। भले उसकी वजह से मेरी जमीन, हवा और पानी पहले से साफ, पहले से बेहतर हो गई हो। पर कोरोना नामक इस बीमारी ने लाखों इंसानों को हमेशा के लिए हमसे दूर कर दिया। 




यह जरूर है कि इस बीमारी ने हमें बहुत कुछ सिखाया है। क्या इंसान इस सीख को अपने जीवन में अपनाएंगे। अगर वे अपना जीवन बेहतर बनाना चाहते हैं तो जरूर अपनाना चाहिए। क्योंकि उनका जीवन छोटा है। यह उन्हें ही सोचना है कि अपनी आने वाली पीढ़ियों के लिए वे कैसी धरती, कैसा पर्यावरण छोड़कर जाना चाहते हैं। वे साफ हवा, पानी, जमीन चाहते हैं कि बीमारी फैलाने वाली गंदी हवा, जहरीला पानी और बंजर होती जमीन। कम से कम मां के रूप में अपने बच्चों के लिए मैं तो ऐसा नहीं चाहती। और मेरे लिए केवल इंसान नहीं, धरती के पेड़, पौधे, हाथी, बंदर, शेर, बैल, गाय, बकरी, पक्षी, तमाम कीड़े-मकोड़े सब मेरे बच्चे हैं। मैं चाहती हूं कि ये सब अच्छी से रहें। क्या मेरी इच्छा पूरी होगी?

तुम्हारी धरती मां...