Wednesday, July 21, 2010

पत्र्कारिता में आपातकाल

प्रेस विज्ञप्ति




विषय- अघोषित आपातकाल में पत्रकारों की भूमिका

संदर्भ- स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद पांडेय की कथित मुठभेड़ पर उठे सवाल



नई दिल्ली। 20 जुलाई। गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘जर्नलिस्ट फॉर पीपुल’ की ओर से ‘अघोषित आपातकाल में पत्रकारों की भूमिका’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

इस विषय पर बोलते हुए आर्य समाज के नेता और समाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेष ने कहा कि आज देश में आपातकाल जैसी स्थितियां हैं। स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय और भाकपा (माओवादी) के प्रवक्ता कॉमरेड आजाद की कथित मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए स्वामी अग्निवेष ने उनकी शहादत को सलाम पेश किया। और कहा कि इस इस दौर में पत्रकारों को साहस के साथ खबरें लिखने की कीमत चुकानी पड़ रही है।

‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के सलाहकार संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा ने स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय और भाकपा माओवादी के प्रवक्ता आजाद की हत्या को शांति प्रयासों के लिए धक्का बताया। गौतम ने कहा कि आज राजसत्ता का दमन अपने चरम पर है। आजादी का ख्याल एक है। इसे अलग-अलग टुकड़ों में नहीं देखा जा सकता। देश के अलग-अलग हिस्से में सरकार अलग-अलग तरीके से पत्रकारों का दमन कर रही है। माओवादियों के संघर्ष, उत्तरपूर्व के संघर्ष और कश्मीर के संघर्ष को एक करके देखना होगा।


संगोष्ठी को संबोधित करते हुए ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि अब सरकारें अपने बताए हुए सच को ही प्रतिबंधित कर रही हैं। और जो भी पत्रकार इसे उजागर करने की कोशिश करता है उसे गोली मार दी जाती है। या देशद्रोही करार दे दिया जाता है। सही सूचनाएं पहुंचाने वाले संगीनों के साए में जी रहे हैं। उन्होने इस स्थिति के विरोध के लिए संगठन बनाने की जरूरत पर बल दिया।

इस मौके पर अंग्रेजी पत्रिका ‘हार्ड न्यूज’ के संपादक अमित सेन गुप्ता भी मौजूद थे। उन्होने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता कारपोरेट घरानों के इशारे पर संचालित हो रही है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्थिति और भी बुरी है। न्यूज चैनल के संपादक बॉलीवुड सितारों के गलबहियां करते नजर आते हैं। और अभिनेताओं से खबर पढ़वाई जाती है। नेता-कारपोरेट घरानों और मीडिया के गठजोड़ पर बोलते हुए अमित ने कहा कि देश के अलग अलग हिस्से में हुई घटनाओं को अलग अलग तरीके से पेश किया जाता है। खासकर एक संप्रदाय विशेष के लिए मुख्यधारा की मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। गुजरात दंगों और बाटला हाउस एनकाउंटर की रिपोर्टिग पर भी अमित सेन ने सवाल उठाए।

कवि और सामाजिक कार्यकर्ता नीलाभ ने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता के मूल्यों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर ‘सांस्कृतिक आंदोलन’ की जरूरत है। सरकारी दमन के मसले पर हिंदी के लेखकों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए उन्होने संस्कृति-कर्मियों, कलाकारों, चित्रकारों की एकता और आंदोलन की जरूरत पर बल दिया।

गोष्ठी को पत्रकार पूनम पांडेय ने भी संबोधित किया और कहा कि आपातकाल केवल बाहर ही नहीं है बल्कि समाचार पत्रों के दफ्तरों में भी पत्रकारों को एक किस्म के अघोषित आपातकाल का सामना करना पड़ता है।

इस मौके पर हिंदी के तीन अखबारों (नई दुनिया, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण) के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया गया। इन अखबारों ने पत्रकार हेमचंद्र पांडेय की मुठभेड़ में हुई हत्या के बाद तत्काल नोटिस जारी करते हुए हेमचंद्र को पत्रकार मानने से ही इंकार कर दिया था।
गोष्ठी के आखिर में पत्रकार हेमचंद्र की याद में हर साल दो जुलाई को एक व्याख्यान माला शुरु करने की घोषणा की गई।


इस गोष्ठी को समायकि वार्ता से जुड़ी पत्रकार मेधा, उत्तराखंड पत्रकार परिषद के सुरेश नौटियाल, जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी के शाह आलम और ‘समयांतर’ के संपादक पंकज बिष्ट, पीयूसीएल के संयोजक चितरंजन सिंह ने भी संबोधित किया।


गोष्ठी का संचालन पत्रकार भूपेन ने किया। इस कार्यक्रम में बड़ी तादात में पत्रकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता भी मौजूद थे।

जर्नलिस्ट फॉर पीपुल की ओर से जारी

संपर्क
अजय प्रकाश (9910820506)
विश्वदीपक (9910540055)

Tuesday, June 22, 2010

इस व्‍यवस्‍था में तो यही होगा

कांग्रेस ने पहले ही कह दिया था कि भोपाल गैस हादसा और उसके बाद होने वाला सारा घटनाचक्र व्‍यवस्‍‍थागत खामियों का नतीजा था, और हम सारे यानी भोपाल के गैस पीडितों, उनके आंदोलन के समर्थकों से लेकर मीडियाकर्मियों तक यह खुशफहमी पाल बैठे थे कि बिना व्‍यवस्‍था बदले हमें इंसाफ मिल जाएगा,
आखिरकार वही हुआ जो इस व्‍यवस्‍था में होना था, महज 6 फीसदी लोगों को मुआवजे की मरहमपट़टी, लेकिन असल गुनहगार अब भी ठहाके मारकर हंस रहे हैं, चाहे वह अमेरिका में बैठा एंडरसन हो या अपने देश में घूम रहा केशुब महिंद्रा,
आखिर कांग्रेस और मध्‍यप्रदेश की भाजपा सरकार के मंत्री जो मंत्र्ीसमूह में शामिल थे, इस बात पर क्‍यों खामोश रहे कि एंडरसन की निजी संपत्ति कुर्क की जाए, डाउ केमिकल से हर्जाना वसूला जाए, यूनियन कार्बाइड की भारतीय हिस्‍सेदारी खरीदने वाली एवरेडी को भी इस जुर्माने का हिस्‍सा बनाया जाए और केशुब महिंद्रा की कंपनी से भी भारीभरकम जुर्माना वसूल कर यह कडा संकेत दिया जाए कि भविष्‍य में अगर ऐसा कुछ हुआ तो उसके जिम्‍मेदारों को कतई बख्‍शा नहीं जाएगा,
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्‍योंकि आज भी वही व्‍यवस्‍था है जो 7 दिसंबर 1984 को एंडरसन को गिरफ़तार करने और महज कुछ ही घंटों में गेस्‍टहाउस में रखकर वीआईपी की तरह सरकारी हवाईजहाज से दिल्‍ली के लिए रवाना करने की जिम्‍मेदार थी, केवल नाम और चेहरे बदले हैं व्‍यवस्‍‍था नहीं, यह असलियत भोपाल और देश की जनता जितनी जल्‍दी समझ ले उतना अच्‍छा होगा,
भोपाल गैस कांड से पीडित 5 लाख से अधिक लोग आज केवल कांग्रेस और भाजपा सरकारों को कोस ही सकते हैं, लेकिन कल यही लोग स्‍थानीय नेताओं और उनके ठेकेदारों के बहकावे में आकर एक बार फिर इन्‍हीं पार्टियों को वोट देंगे और इसी व्‍यवस्था को फिर से खडा कर देंगे, आखिर इन्‍हीं लोगों के वोट के दम पर ये नेता भोपाल और दिल्‍ली की कुर्सियों पर बैठे हैं और लाचार वर्तमान तथा खौफजदा भविष्‍य की कीमत पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं,
देश के दूसरे हिस्‍सों के जो लोग भोपाल की लडाई को यह समझकर देख रहे हैं कि इसका हमसे क्‍या लेनादेना उन्‍हें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्‍ता के ये दलाल एक दिन उन्‍हें ही इसी तरह कीडेमकोडों की तरह तडपकर मरने पर मजबूर कर देंगे और तब उन्‍हें इस लडाई में न शामिल होने का अफसोस होगा,
जब नर्मदा आंदोलन के कार्यकर्ता सरदार सरोवर बांध के विरोध में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे थे तब कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि यह तय करना कोर्ट का नहीं सरकार का काम है कि देश का विकास किस तरह का होना चाहिए, इस बुनियादी फैसले से तभी समझ जाना चाहिए था कि आम जनता के दुखदर्द और उनके आंसुओं का देश के विकास और पूंजीपतियों की सरकार से कोई लेना देना नहीं है, जब तक जनता जुनून बनकर इस व्‍यव्‍स्‍था को नहीं बदलेगी उसे इसी तरह जुल्‍म और जिल्‍लत बर्दाश्‍त करनी पडेगी, लेकिन याद रखने वाली बात है कि एक दिन स्‍पार्टकस ने भी बगावत कर ही थी, आखिर हम कब तक सहन करेंगे,,,,,

Friday, June 18, 2010

सारी खामी व्‍यवस्‍था की है

भोपाल गैस कांड के बाद वारेन एंडरसन की गिरफ़तारी और बाद में सरकारी हवाईजहाज से उसे भोपाल से दिल्‍ली और दिल्‍ली से अमेरिका सुरक्षित भेजने को कांग्रेस ने व्‍यवस्‍थागत खामी का नतीजा बताया है, एकदम सटीक बात, पता नहीं क्‍यों कांग्रेस की इस सनसनीखेज स्‍वीकारोक्ति पर मीडिया वालों या विपक्ष के कान खडे नहीं हुए, कहीं कोई सुगबुगाहट नहीं, कोई प्रतिक्रिया नहीं,
कांग्रेस ने सच ही कहा, अब आप शुरू से लें, भोपाल में दो और तीन दिसंबर की रात करीब 1 बजे गैस रिसी, सुबह पांच बजे एफआईआर दर्ज कर ली गई, इसमें पुलिस ने धारा 304 लगाई जिसमें कम से कम 10 साल कैद का प्रावधान है, लेकिन व्‍यवस्‍थागत खामी यहीं से शुरू हो गई, सरकार कांग्रेस की थी, केंद्र में भी और प्रदेश में भी, सबको पता था कि जो धारा एफआईआर में लग गई वह सबके गले पड जाएगी, एंडरसन के भी, और आगे भारत में होने वाले अमेरिकी निवेश के भी, सो सरकार ने आनन,फानन में धारा में जरूरी छेडछाड करवाई, यानी 304 के आगे एक छोटा सा ए और जोड दिया ताकि एंडरसन या यूनियन कार्बाइड के किसी अन्‍य अधिकारी को ज्‍यादा तकलीफ न पहुंचे, बकौल खुद अर्जुन सिंह, हम एंडरसन को परेशान नहीं करना चाहते थे, व्‍यवस्‍थागत खामी,
बात और आगे चलेगी इन खामियों के बारे में,

Sunday, June 13, 2010

टृक हादसा ही तो है भोपाल गैस कांड

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एएम अहमदी के इस फैसले पर काफी हायतौबा मचाई जा रही है कि उन्‍होंने भोपाल गैस हादसे से जुडी धाराओं में बदलाव कर इसे मामूली टृक हादसे सरीखा बना दिया, मुझे लगता है कि उन्‍होंने ठीक ही किया, हमारे देश में कानूनों और उनका पालन करवाने वालों का जो हाल है उसे देखते हुए इन दोनों में कोई फर्क नहीं है,
अगर हमारे यहां टृक हादसे होने बंद हो जाएं तो भोपाल गैस हादसा भी नहीं होगा, शायद अहमदी अपने फैसले से देश को यही संदेश देना चाहते थे, हालांकि इस फैसले से यूनियन कार्बाइड और उससे जुडे अधिकारियों, नेताओं को जो फायदे हुए या खुद अहमदी को जो कुछ अतिरिक्‍त मिला वह जांच का विषय हो सकता है
आप देखें कि सडक पर होने वाले अधिकांश हादसों के लिए हमारा वही तंञ जिम्‍मेदार है जो भोपाल गैस हादसे के लिए जिम्‍मेदार है, इसकी शुरुआत डाइवर को मिलने वाले लाइसेंस से होती है, गलत आदमी को लाइसेंस देने का अर्थ है भविष्‍य में होने वाले हादसे को न्‍यौता देना, ठीक इसी तरह सत्‍तर के दशक में भोपाल के ठीक बीचोंबीच घातक कीटनाशक तैयार करने वाली यूनियन कार्बाइड को मंजूरी देकर तत्‍कालीन नेताओं, अधिकारियों ने भविष्‍य में एक हादसे की जमीन तैयार कर दी थी,
यह पहली गलती काफी हद तक ठीक की भी जा सकती थी अगर गलत लाइसेंस मिलने के बावजूद सडक पर चल रहे वाहन की मेंटनेंस, स्‍पीड और डाइवर के नशे में होने या न होने के बारे में यातायात पुलिस अपना काम सही करती, यानी वाहन के ब्रेक फेल नहीं होते, वह समय पर रुक जाता और डृाइवर होशोहवाश में रहता तो तय था कि हादसा रोका जा सकता था,
ठीक इसी तरह अगर यूनियन कार्बाइड के मामले में प्रदूषण नियंञण के अधिकारी व खुद यूसी के अधिकारी समयसमय पर यह जांच करते कि कंपनी में मेंटनेंस सही ढंग किया जा रहा है, लीकेज नहीं हो पा रहा है, सुरक्षा मानकों का पालन हो रहा है तो यह हादसा नहीं हुआ होता,
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, और एक मामूली सडक हादसे की ही तर्ज पर भोपाल गैस हादसा हो गया, सडक हादसे में चार लोग मरते हैं, यहां 25 हजार जानें गईं, लेकिन कारण कमोबेश वही था, लापरवाही, भ्रष्‍टाचार और खुदगर्जी,

जारी

Saturday, June 12, 2010

आखिर एंडरसन ने किया क्‍या है

भोपाल गैस हादसे के लिए इन दिनों हर कोई एंडरसन के पीछे हाथ धोकर पडा हुआ है, मानो उसे पकड लिया तो भोपाल में हुई 25 हजार मौतों और लाखों लाइलाज बीमारियों का हल मिल जाएगा, दुख तो इस बात का है कि भोपाल में गैस हादसा होने देने के लिए एंडरसन की यूनियन कार्बाइड को जिन् लोगों की लापरवाही और जिल्‍लत भरी लालच ने इजाजत और मौका दिया उन्‍हें कोई क्‍यों नहीं पकड रहा है,
आखिर केशब महिंद्रा ही वह शख्‍स था जो तब यूनियन कार्बाइड का चेयरमैन था और जाहिर तौर पर भारत में कंपनी के हर मुनाफे की तरह उससे होने वाली तबाही के लिए जिम्‍मेदार भी, अगर वह आज महिंद्रा और महिंद्रा का चेयरमैन बनकर करोडों रुपए का मालिक बना बैठा है तो क्‍या मीडिया की यह जिम्‍मेदारी नहीं बनती कि एंडरसन के ही बराबर उसे भी जिम्‍मेदार समझें और एंडरसन के प्रत्‍यर्पण की ही तर्ज पर देश में मौजूद इस अदालत की ओर से दोषी करार दिए गए अपराधी को सजा का हकदार बनाने की मुहिम छेडें,
लेकिन आज मीडिया के लिए महिंद्रा विज्ञापन का एक बडा स्रोत है जबकि एंडरसन के खिलाफ अभियान छेडनें में नुकसान नहीं फायदा ही फायदा है, सो सारे अखबार और चैनल देशी अपराधियों को छोडकर अमेरिका में जा बसे एंडरसन के पीछे हाथ धोकर पडे हैं, सवाल इस बात का है कि जो केशब महिद्रा 84 में यूनियन कार्बाइड के हादसे के लिए दोषी ठहराया जा चुका है उसकी तमाम कंपनियों को किस आधार पर देश में चलने की मंजूरी दी जा रही है आखिर इस बात की क्‍य गारंटी है कि उसकी कंपनियों से देश में ऐसे और भोपाल गैस हादसे नहीं होंगे,

जारी

Friday, April 17, 2009

अन्नदाता की खुदकुशी का इंतजाम




रामनवमी के पावन दिन जब भारतीय जनता पार्टी नई दिल्ली में राम, रोटी और किसानों को राहत की रेवड़ियां बांटने वाला चुनाव घोषणा पत्र जारी कर रही थी, ठीक उसी समय भाजपा शासित मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल से महज सौ किमी दूर स्थित पिपरिया के कुर्सीढाना गांव में एक किसान कीटनाशक जहर पीकर मौत को गले लगा रहा था। यह मध्यप्रदेश में बीते तीन दिनों में किसानों द्वारा की जाने वाली तीसरी खुदकुशी थी। और साथ ही भारतीय राजनीति के चुनावी वादों, घोषणाओं और जमीनी असलियत के बीच की कड़वी सच्चाई भी।
बात केवल भाजपा के घोषणापत्र की नहीं है, कांग्रेस ने भी अपने घोषणापत्र में किसानों को राहत देने की कई लोकलुभावन बातें कहीं हैं; मसलन, कम ब्याज दर पर कर्ज, कर्ज भुगतान करने वाले किसानों के लिए ब्याज दरों पर छूट और फसल बीमा योजना। उधर भाजपा ने अपने घोषणापत्र में किसानों को कृशि कर्ज माफ करने, कृषि कर्ज महज 4 फीसदी ब्याज पर देने और साढ़े तीन करोड़ हैक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को सिंचित करने का वादा किया है, वहीं माकपा ने ग्रामीण क्षेत्रों में ज्यादा बिजली आपूर्ति करने व न्यूनतम समर्थन मूल्य का दायरा बढ़ाने का वादा कर किसानों को ललचाने की कोशिश की है। लेकिन ये तमाम घोषणाएं दम तोड़ते किसानों और संकट में घिरती भारतीय कृषि को संजीवनी देने की बजाय उनकी मुसीबतें और ज्यादा बढ़ाने वाली हैं।
जरा गौर करें, फिर से सत्ता में लौटने का मंसूबा पाल रही कांग्रेस हो या राम लहर पर सवार होकर सत्तानशीं होने का सपना संजोने वाली भाजपा या फिर नए सहयोगियों के दम पर दिल्ली में लाल परचम फहराने की जुगत में भिड़ी माकपा, इन तीनों में से किसी भी पार्टी के घोषणापत्र में देश के अन्नदाता किसानों को खुदकुशी से बचाने के लिए कोई भी उपाय नहीं बताए गए हैं। जितनी भी घोषणाएं की गई हैं, वे महज इस खानापूरी के लिए हैं कि खुदकुशी की यह दर थोड़ी कम की जाए। ध्यान देने वाली बात यह है कि महाराष्‍टृ से कर्नाटक और आंध्रप्रदेश से मध्यप्रदेश तक जहां भी किसानों की खुदकुशी एक गंभीर समस्या बनी हुई है किसी भी सरकार ने इस पर गौर नहीं किया कि किसानों को खुदकुशी की ओर धकेलने वाले कारणों को तलाशा जाए और उनपर रोक लगाई जाए ताकि किसान खुदकुशी करने पर मजबूर न हों।
आंकड़े बताते हैं कि 1997 से 2008 तक भारत में डेढ़ लाख से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं। इनमें ऊपर बताए गए राज्यों के अलावा छत्तीसगढ़, गुजरात, पंजाब, उड़ीसा तथा केरल के किसान शामिल हैं। और यही वह समय भी है जब देष में बीटी कॉटन यानी जेनेटिकली मॉडिफाइड बीजों का प्रचलन जोर पकड़ रहा था। सन 2002 में जहां देश में करीब 27 हजार हैक्टेयर क्षेत्र में बीटी कॉटन की खेती होती थी, यह दायरा 2006 में बढ़कर 38 लाख हैक्टेयर पहुंच गया। इसी के साथ किसानों की परेशानियों का दौर भी बढ़ता चला गया। किसानों की खुदकुशी के कारणों पर खुद सरकारी संस्थाओं के अलावा तमाम गैर सरकारी संगठनों के अध्ययनों व रिपोर्टों पर अगर विभिन्न राजनीतिक पार्टियों ने एक नजर डाली होती तो किसानों को कर्ज माफी या कम ब्याज के कर्ज के चुनावी वादों की बजाय जीएम तकनीकी वाले बीजों पर अंकुश लगाने, देशी बीजों, तकनीक को प्रोत्साहित करने और कम लागत की स्थानीय माहौल के अनुकूल फसल लगाने को प्रोत्साहित करने का जिक्र अपने चुनावी घोषणा पत्र में करते। लेकिन इससे विदेशी बीज व दवा की कंपनियों से होने वाले मुनाफे में कमी आ जाती। संभवत: यही वजह है कि देश के हजारों किसानों की मौत को दरकिनार कर सत्ताशीन और विरोधी दल, जिन्होंने विदेशी कंपनियों से मिलने वाले मुनाफे पर अपनी आंखें गड़ाई हुई हैं और बीमारी को जड़ से उखाड़ फेंकने की बजाय रोगी के इलाज में हर दिन होने वाली कमाई में अंधे डाक्टर की ही तरह किसान को मौत से बचाने की बजाय उसके परिवार को मुआवजा देकर मिलने वाली सहानुभूति और अंतत: वोट लेकर सत्ता की राजनीति खेलने में जुटे हुए हैं। सोचने वाली बात है कि महज बीटी काटन के असर से जब मध्यभारत के अन्नदाता किसानों की जान पर बन आई है तो आने वाले समय में बीटी भिंडी, बीटी बैंगन व अन्य जीएम सब्जियों व फसलों के आने से अन्य राज्यों के किसानों का क्या हाल होगा।
इसकी ताजा मिसाल है हाल ही में सुप्रीम कोर्ट का वह नोटिस जो उसने विदेशी बीज कंपनी माइको को बिना जरूरी मंजूरी लिए झारखंड में बीटी बीज का प्रयोग करने पर कंपनी समेत केंद्र सरकार को भी जारी किया है।
हालांकि हमें इससे यह मुगालता नहीं पालना चाहिए कि किसानों को उनकी संभावित मौत से बचाने के लिए कोर्ट ही आखिरी रास्ता सुझाएगी। देश के तमाम जनांदोलनों के सिलसिले में अलग-अलग समय में सुनाए गए फैसलों में कोर्ट ने साफ कर दिया है कि वह कानून बनाने नहीं उनका पालन नहीं होने की दशा में कार्रवाई करने वाली निकाय है, ऐसे में लोगों को सारा दबाव कानून बनाने वालों यानी अपने जनप्रतिनिधियों पर ही डालना चाहिए। लेकिन देश में किसान संगठनों की वर्तमान हालत और असली पीड़ित किसानों के बीच किसी तरह के संगठन या राजनीतिक दबाव की स्थिति बना पाने की नाकामी से ऐसा होना संभव नहीं दिखता। बात महाराष्‍टृ के विदर्भ क्षेत्र के किसानों के लिए 11000 करोड़ के पैकेज की हो या फिर चुनाव से पहले देश भर के किसानो की कर्ज माफी के लिए 60 हजार करोड़ की सरकारी घोषणा की हो, देश के किसानों तक सरकार के ये पैकेज नहीं पहुंचे, किसानों की लगातार हो रही मौतें तो यही दर्शाती हैं। सरकारी मशीनरी की लापरवाही, जानलेवा उदासीनता लालफीताशाही देश की जमीन को किसानों के खून से लाल करती ही रहगी। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि देश के आगामी कर्णधारों ने अपने चुनावी घोषणापत्रों में अन्नदाता की खुदकुशी का माकूल इंतजाम कर दिया है।

Sunday, February 1, 2009

क्‍या नर्मदा का होगा लोप

अमरकंटक में घटती हरियाली का अंदाजा इस सैटेलाइट फोटो से लगाएं, इसमें नर्मदा कुंड आसपास के इलाके मेंफैला बंजर इलाका साफ तौर पर देखा जा सकता है।






मध्यप्रदेश के हरे-भरे शिखर गौरव अमरकंटक (पर्यंक पहाड़) के बारे में एक पौराणिक कथा काफी प्रचलित है। इसके मुताबिक राजा हिरण्यकश्यप के अत्याचारों व पापों से दुखी होकर लोपित हुई नर्मदा को वापस धरती पर धारण करने के लिए जब दूसरे सभी पर्वतों ने असमर्थता जता दी तब इस विंध्याचल पुत्र ने अपनी मजबूत वादियों में नर्मदा की तेज धार सहन की थी। नर्मदा की इस वापसी के लिए राजा पुरुरवा ने कठो तप किया था ताकि उसके पवित्र जल से सारे संसार का पाप धोया जा सके। इस मिथक को बताने का मकसद केवल यह है कि एक बार फिर नर्मदा का लोप होने जा रहा है। और इस बार कोई पुरुरवा उसे वापस अमरकंटक की वादियों में कल-कल की आवाज पर बहने पर राजी नहीं कर पाएगा। क्योंकि वर्तमान हिरण्यकश्यप बने जंगल तस्करों व बाक्साइट खदानों से यह वादी इतनी खोखली और बंजर हो चुकी है कि आने वाले दिनों में उसमें नर्मदा को धारण करने का सामर्थ्य ही नहीं बचेगा।

इसकी शुरुआत नर्मदा के मैलेपन से हो चुकी है। हाल ही मध्यप्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की ओर से नर्मदा के जल की शुध्दता जांचने के लिए किए गए एक परीक्षण में पता चला है कि अमरकंटक में नर्मदा सबसे ज्यादा मैली है।

गौरतलब है कि अमरकंटक र्मदा और सोन सरीखी राष्ट्रीय महत्व की बड़ी नदियों का उद्गम स्थ है। समुद्र तल से 1067 मीटर की ऊंचाई पर बसे इस क्षेत्र का महत्व केवल इसके ऐतिहासिक व धार्मिक स्थानों के कारण नहीं है, बल्कि यहां के घने (अब विलुप्तप्राय) जंगलों, उनमें मौजूद ब्राह्मी, तेजराज, भोगराज, सर्पगंधा, बलराज जैसी दुर्लभ व बेशकीमती जड़ी बूटियों व बाक्साइट जैसे खनिजों में भी बहुतों का ध्यान इस ओर खींचा है। इसी का नतीजा है कि आज न केवल यहां के जंगल और जड़ी बूटियां खात्में की ओर हैं बल्कि समूचे अमरकंटक के पर्यावरण व पारिस्थितिकीय के संदर्भ में इसका अस्तित्व ही संकट में पड़ गया है। एक सरकारी अनुसंधान के मुताबिक यहां करीब 635 प्रजातियों के वनस्पति है।

1967 से 1974 के दौरान यहां औसत सालाना बारिश 62 इंच थी, स्थानीय बड़े-बूढ़ों के मुताबिक तब यहां गर्मियों में भी रोजाना दो से तीन बार पानी बरस जाता था। लेकिन 1974 से 1984 के बीच यह औसत घटकर 53 इंच हो गया। इसी बीच सन 75 में यहां बाक्साइट की खदानें भी खुल गईं। इस खदानों और जंगल काटने की गतिविधियों का असर 1984 से 1994 तक के सालाना बारिश के औसत से पता चलता है जो घटकर 44 इंच तक पहुंच चुका था। इसी प्रकार यहां तापमान में बढ़ोतरी भी इस क्षेत्र के अनियंत्रित दोहन के परिणाम दर्शाती है। साठ के दशक में शून्य से 10 डिग्री कम तापमान में ठिठुरने वाले अमरकंटक को अब गर्मियों में 42-44 डिग्री की झुलसाने वाली गर्मी बर्दाश्त करनी पड़ रही है। आंकड़ों के मुताबिक यहां हर दशक में दो डिग्री तापमान बढ़ रहा है।

जाहिर है कि इस हरे-भरे पर्वतीय क्षेत्र को अपने गर्भ में बाक्साइट जैसी कीमती खनिज को छिपाने की कीमत चुकानी पड़ रही है। इस कीमत में घटते जंगल, कम होती जड़ी-बूटियां, क़म बारिश, बढ़ता तापमान, विकृत होता प्राकृतिक सौंदर्य और भू-क्षरण तो शामिल है ही, तेजी से घटता जल स्तर भी स्थानीय लोगों की समस्याएं बढ़ा रहा है। अमरकंटक में बाक्साइट खदानों के कारण जल स्तर 300 से 400 फीट तक नीचे चला गया है। इसके चलते तथा नर्मदा कुंड के आसपास फैले आश्रमों में लगे नलकूपों से लगातार पानी खींचने के कारण कुंड तेजी से सूखता जा रहा है। पर बाक्साइट की खुदाई में लगे सरकारी व निजी अभिक्रम धड़ल्ले से पानी खींच रहे है। यह विडंबना ही कही जाएगी कि मध्यप्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी जिसके पानी का भरपूर दोहन करने के लिए नर्मदा घाटी परियोजना के तहत 3000 से भी ज्यादा छोटे-बड़े बांध बनाए जा रहे हैं। उसी के उद्गम स्थल के लोग आज गंभीर पेयजल संकट से जूझ रहे हैं। पेयजल के अलावा दूसरा मुख्य संकट नर्मदा के उद्गम स्थल के सूखने का है, जिससे यहां के धार्मिक व ऐतिहासिक महत्व पर कालिमा पड़ने की आशंका है।


गौरतलब है कि नर्मदा देश की सबसे पवित्र नदी मानी जाती है। प्रचलित मान्यता यह है कि यमुना का पानी सात दिनों में, गंगा का पानी छूने से, पर नर्मदा का पानी तो देखने भर से पवित्र कर देता है। साथ ही जितने मंदिर व तीर्थ स्थान नर्मदा किनारे हैं उतने भारत में किसी दूसरी नदी के किनारे नहीं है। लोगों का मानना है कि नर्मदा की करीब ढाई हजार किलोमीटर की समूची परिक्रमा करने से चारों धाम की तीर्थयात्रा का फल मिल जाता है। परिक्रमा में करीब साढ़े सात साल लगते हैं। जाहिर है कि लोगों की परंपराओं और धार्मिक विश्वासों में रची-बसी इस नदी के उद्गम स्थल का महत्व और भी बढ़ जाता है, जिसका आभास हर साल महाशिवरात्रि के अवसर पर यहां आने वाले लाखों श्रध्दालुओं से होता है। लेकिन दुर्भाग्य से यह पर्व भी इस दर्शनीय स्थल की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार कारकों में जुड़ जाता है। इन लाखों लोगों के ठहरने, खाने आदि की व्यवस्था न होने के कारण बड़ी संख्या में लोग आसपास के जंगलों में ठहरते हैं। जहां उन्हें खाना पकाने के लिए मुफ्त लकड़ी मिल जाती है। लेकिन फरवरी में जब पर्व खत्म होता है तो यहां के जंगलों का दृश्य काफी भयावह होता है।


स्थानीय वन अनुसंधान विभाग में रेंजर जयजीत करकेटा के मुताबिक, बाक्साइट खदानों व आश्रमों के द्वारा जंगलों का जो नुकसान हो रहा है वह तो है ही, यहां के जंगलों में रुकने वाले श्रध्दालु जो आग छोड़ जाते हैं वह भी अक्सर विकराल रूप धारण का भारी नुकसान पहुंचाती है। इस समय आग लगने से ज्यादा नुकसान इसलिए होता है क्योंकि बारिश में उगे पेड़ों व जड़ीबूटियों में इस समय तक डेढ़ से दो फुट तक की बढ़ोतरी हो चुकी होती है। और वे इस आग से पूरी तरह जलकर खत्म हो जाते हैं। करकेटा जंगलों के विनाश के लिए आश्रमों से जुड़े महंतों व मठाधीशों की ऊंची पहुंच को भी काफी हद तक जिम्मेदार ठहराते हुए कहते हैं कि जब भी हम इन आश्रम से जुड़े लोगों द्वारा अवैध तरीके से ले जाई जा रही लकड़ी पकड़ते हैं, हमें अपने अधिकारियों की नाराजगी झेलनी पड़ती है। यहां विभिन्न आश्रमों के महंतों की आपसी प्रतिस्पर्धा के चलते बाहर से गुंडे बुलाकर हत्या कराने की कोशिशों व हथियार व नशीले पदार्थों की तस्करी में हाथ होने के आरोपों से इनकी भूमिका पर भी सवाल खड़े हो गए हैं।

यहां बालको और हिंडालको की बाक्साइट खदानों से जंगल काफी प्रभावित हुए हैं। बालको ने 920 हेक्टयेर क्षेत्र की सफाई कर खदानें खोद डालीं वहीं हिंडालको भी 106 एकड़ क्षेत्र से बाक्साइट निकाल कर ज्यादा पीछे नहीं रहा। फिलहाल बालको का काम बंद हो चुका है लेकिन हिंडालको यहां के जंगलों को काटकर बाक्साइट खोद निकालने में जुटा हुआ है। कंपनी का दावा है कि खदानों से खत्म हुए जंगल के बदले में वह कई गुना ज्यादा जंगल लगा चुकी है। लेकिन इस दावे की सच्चाई बाक्साइट की खुली हुई खदानों से जांची जा सकती है। जो वृक्षारोपण हुआ है वह भी जरूरत के हिसाब से पूरा नहीं है। बाक्साइट के अलावा इस क्षेत्र में मुरुम व लाल, पीली मिट्टी का पाया जाना भी इसके नंगे होने का कारण बन गया है। आसपास के तमाम ठेकेदार जी-जान लगाकर यहां की प्राकृतिक संपदा को नोचने, खसोटने में लगे हैं। इस अंधाधुंध दोहन के नतीजे जानने के लिए यहां की संक्षिप्त भौगोलिक जानकारी जरूरी है। यह क्षेत्र सतपुड़ा और मैकल पर्वत श्रेणियों के बीच स्थित है जहां ज्वालामुखी से निकले काले पत्थर कालांतर में रूपांतरित होकर बाक्साइट व मुरुम बन गए हैं।

इनकी खासियत यह है कि ये स्पंज की तरह पानी सोख लेते हैं और उसे धीरे-धीरे छोड़ते रहते हैं। लेकिन बाक्साइट खनन की प्रक्रिया के जारी रहने से नर्मदा को बांधकर रखने वाले पेड़ों की जड़ें तेजी से खत्म हो रही हैं। इनके नतीजों का अनुमान इस जानकारी से होता है कि नर्मदा कुंड व डेढ़ किलोमीटर दूर माई की बगिया नामक स्थान (जहां नर्मदा पहली बार दिखकर विलुल्प हो जाती है) के बीच की दलदली जमीन अब सख्त हो चुकी है।

अमरकंटक के पर्यावरण विनाश को अंतिम चरण तक पहुंंचाने का काम अंजाम दे रहा है यहां का वन विभाग। कुछ सालों पहले अमरकंटक व नजदीकी मंडला जिले के लाखों साल (सरई) के वृक्षों को काटने का आदेश दिया गया था। इस आदेश के खिलाफ पर्यावरण प्रेमियों ने कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया लेकिन केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने दलील दी थी कि बोरर कीटों से प्रभावित साल वृक्षों को काटने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है। इस मसले पर कई ऐसे सवाल खड़े हुए थे जिनका जवाब आज तक नहीं मिल सका है। मसलन, अगर इन कीड़ों के प्रकोप की जानकारी वन विभाग को पहले से थी तो प्रतिरोधक उपाय अपनाकर पेड़ों को बचाने की कोशिश क्यों नही की गई; इस बात की क्या गारंटी है कि काटे जा रहे तमाम पेड़ बोरर कीटों से प्रभावित ही हैं। सच्चाई तो यह है कि बोरर की आड़ में बड़ी संख्या में मोटे-ऊंचे पेड़ काटकर वन माफिया द्वारा बेच दिए गए और करोड़ों की कमाई की गई।

साफ है कि आश्रमों, बाक्साइट, खदानों, वन तस्करों व श्रध्दालुओं के साथ-साथ सरकारी विभाग भी अमरकंटक की हरियाली और अंततोगत्वा यहां का प्राणतत्व खत्म करने में जुटे हुए हैं। यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है कि मध्यप्रदेश के इस दर्शनीय पर्यटन व धार्मिक महत्व के स्थल को को बचाने की बजाय खत्म करने की कोशिश की जा रही है। ऐसे में हम सबका यह दायित्व बनता है कि अपनी ओर से ऐसी हर कोशिश के खिलाफ आवाज उठाएं।








Wednesday, November 19, 2008

लक्ष्‍मी की जिद



लक्ष्‍मी अपने साथ हुए अन्‍याय का प्रतिकार करना चाहती है। पिछले साल 24 नवंबर को सरे राह कुछ मध्‍यम वर्गीय कथित शहरियों ने उसका चीरहरण किया था। उसके शरीर पर वस्‍त्र का एक टुकड़ा भी नहीं रहने दिया गया था। शहरियों की यह नाराजगी इसलिए थी कि लक्ष्‍मी असम की राजधानी गुवाहाटी में रैली निकाल रही उस आदिवासी टीम में शामिल थी जो आदिवासियों के लिए अपनाए जा रही गलत नीतियों का विरोध कर रही थी। लोकतांत्रिक देश में लोकतांत्रिक तरीके से किए जा रहे विरोध प्रदर्शन से नाराज कुछ सभ्‍य समाज के लोगों ने एक आदिवासी महिला को सरे बाजार नंगा कर अपने श्रेष्‍ठ होने का परिचय दिया था। जब कुछ ऐसी ही स्थिति हजारों साल पहले महाभारत में आई थी जब कौरवों की सभा में दुर्योधन ने द्रौपदी का चीरहरण किया तब इसका नतीजा भीषण युद़ध और अंतत: कौरवों की शर्मनाक पराजय के रूप में सामने आया था। इस बार भी लक्ष्‍मी ने बदला लेने की ठानी है, लेकिन व्‍यक्तिगत तौर पर नहीं। यह काम कानून और सरकार का है। मुख्‍यमंत्री निवास से महज कुछ ही दूरी पर हुए इस कांड पर साल बीतने के बावजूद किसी को गिरफ़तार तक नहीं किया जा सका। यह लोकतांत्रिक सरकार की हार है। लेकिन लक्ष्‍मी को अब भी लोकतंत्र पर भरोसा है।

यही वजह है कि इस लड़ाई को निजी नहीं सार्वजनिक हित के लिए लड़ना चाहती है। वह उन महिलाओं में नहीं है जो अपमान के बाद शर्म के चलते खुदकुशी कर लें या खुद को किसी को मुंह दिखाने लायक न समझें। लक्ष्‍मी लोकतांत्रिक तरीके से सम्‍मान पाने की लड़ाई लड़ना चाहती है। वह असम की तेजपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ना चाहती है। इसके लिए उसे असम यूनाइटेड डेमोक्रेट फ्रंट का समर्थन भी मिल गया है।

जरा सोचिए अगर वह आगामी लोकसभा चुनाव जीत गई और एक सांसद की तरह उसी क्षेत्र में दौरा किया जहां उसका चीरहरण किया गया था, तो वहां के उन वाशिंदों के दिल पर क्‍या बीतेगी जिन्‍होंने यह कृत्‍य किया और जिन्‍होंने होते हुए देखा। और सबसे बड़ी बात, लक्ष्‍मी के मन को कितनी बड़ी तसल्‍ली मिलेगी कि उसे एक सांसद के तौर पर जो सम्‍मान मिलेगा उसकी तेज धारा में वह सारा अपमान मिट़टी के धब्‍बे की तरह धुल जाएगा। लक्ष्‍मी को हम सबको समर्थन देना चाहिए, हम उसके लिए वोट भले ही न कर पाएं पर नैतिक रूप से उसका पक्ष जरूर ले सकते हैं। खासकर यह देखते हुए कि देश के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह खुद भी असम से ही राज्‍यसभा के लिए चुने गए हैं। भले ही उन्‍होंने लक्ष्‍मी के साथ घटी इस घटना पर कोई भी टिप्‍पणी न की हो।

Sunday, November 9, 2008

अभी तो बस इतना ही

दोस्‍तो,
अभी तो बस इतना ही कहना चाहता हूं कि बहुत दिनों से लिख नहीं पाया इसका खेद है। दिल से माफी मांगता हूं। इसका एक कारण तो यह था कि कुछ घरेलू काम ज्‍यादा समय मांग रहे थे और दूसरा मुख्‍य कारण यह था कि जिन मुद़दों पर लिखने का मन था वे जितना समय मांग रहे थे उतना देने के लिए था नहीं। बहरहाल, अब उम्‍मीद है कि समय निकल पाएगा। मैं कई विषयों पर लिखना चाहता हूं। राज ठाकरे की मराठी जिद, साध्‍वी प्रज्ञा ठाकुर की तथाकथित राष्‍टीय अस्मिता की जिद, बराक ओबामा के अश्‍वेत और काले लिखे पर मत भिन्‍नता आदि। लेकिन थोड़ा सा समय चाहिए। यह पोस्टिंग केवल इसलिए ताकि अपनी उपस्थिति दर्ज करा सकूं।
सादर आप सभी का
अमन

Wednesday, August 6, 2008

भय और भ्रम का बाजार

'भय बिनु होई न प्रीति', यानी बिना डर के दोस्ती नहीं होती। यह पुरानी कहावत है। इसका नया स्वरूप यह है कि 'भय बिनु होई न बिक्री'। यानी डर के बिना बाजार में माल बेचना संभव नहीं है। जी हां, डर या भय यानी इंसान की सबसे महत्वपूर्ण भावना। पहले जिस डर का इस्तेमाल प्रीति करने या लोगों को खतरनाक हालात से बचाने के लिए किया जाता था, आज वही भावना बाजार को बढ़ाने में बेइंतहा इस्तेमाल हो रही है और खुल्लमखुल्ला। चाहे हम अपने समाचार टीवी चैनलों पर आने वाले अपराध संबंधी वे धारावाहिकनुमा कार्यक्रम देखें जिनमें जरिए हमें अपने आसपास के माहौल से हमेषा सतर्क रहने, किसी पर भरोसा न करने की ताकीद की जाती है। इन चैनलों पर हत्या, बलात्कार, लूट जैसी घटनाओं के नाटकीय रूपांतर हमें अंदर तक भयभीत कर देते हैं, या फिर अखबारों में सुर्खियां बनती इन्हीं खबरों के विस्तार में जाएं जिनसे ऐसा लगता है मानो पूरा समाज हत्यारा, लूटेरा और बलात्कारी हो गया है, और इनके बारे में लगातार जानने के लिए चैनल देखना तथा अखबार पढ़ते रहना जरूरी है। और इसी बढ़ते दर्षक या पाठक वर्ग का फायदा उठाती हैं विज्ञापन एजेंसिंया, जो उन्हीं अखबारों, चैनलों को ज्यादा विज्ञापन देती हैं जिन्हें ज्यादा दर्षक या पाठक मिलते हैं। और हम जाने-अनजाने अपराध, हिंसा, लूट तथा बलात्कार की खबरों के बीच आने वाले विज्ञापनों के शिकार बन जाते हैं।
आइए इस मुद्दे को जरा गहराई से समझते हैं। दरअसल इसके दो पहलू हैं। पहला पहलू विशद्व तकनीकी है, यानी भय का वैज्ञानिक या यूं कहें डाक्टरी पक्ष। अगर इस नजरिए से देखेंं तो हम पाएंगे कि भय, डर या फोबिया की सात सौ से भी ज्यादा तरह की किस्में हैं। यानी हमारे आसपास या दुनिया में कम से कम सात सौ तरह के डर हो सकते हैं। इनमें मरने का डर निश्‍िचत तौर पर सबसे महत्वपूर्ण है, लेकिन ऐसे भी कई भय हैं, जिनके बारे में हममें से ज्यादातर को पता ही नहीं है। मसलन, सड़क पार करने का भय 'एगॉरोफोबिया', विचारों से भय 'ऐलोडोक्साफोबिया', हवा से भय 'एन्क्रेओफोबिया', आदमी से भय 'एंड्रोफोबिया', अंकों से भय 'अर्थमोफोबिया', मिसाइल या गोलियों से भय 'बैलिस्टोफोबिया', किताबों से भय 'बिब्लियोफोबिया', खूबसूरत औरतों से भय 'कैलिगॉयनेफोबिया', बैठने का भय 'कैथिसोफोबिया', पैसों से भय 'क्रोमेटोफोबिया', कंप्यूटर से भय 'साइबरफोबिया', घर का भय 'इकोफोबिया', स्वतंत्रता का भय 'इल्यूथिरोफोबिया', ज्ञान का भय 'एपिस्टेमोफोबिया', ईश्‍वर का भय 'ज्यूसोफोबिया' आदि आदि। इन तमाम तरह के भय या फोबिया के अनेक कारण होते हैं और उनमें से ज्यादातर मनोवैज्ञानिक होते हैं। यानी व्यक्तिगत तौर पर इनमें से किसी भी भय के शिकार लोग मनोवैज्ञानिक के पास जाकर अपनी समस्या का हल कर सकते हैं। लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है जो हमारे लिए कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है। और वह है भय या फोबिया की इस नितांत व्यक्तिगत भावना का व्यापारिक दोहन, यानी इन डरों को बाजार के लिए इस्तेमाल करना। और यही आज विज्ञापन की दुनिया की असल कमाई है।
अगर भय और विज्ञापन के इस रिश्‍ते को थोड़ा पीछे जाकर देखें तो हम पाएंगे कि 90 के दशक में अमेरिकन टेलीविजन पर क्लैरिटन नामक दवा का एक विज्ञापन अभियान चला था, जो दवा उद्योग को अपने उत्पादों का विज्ञापन करने के लिए मिली छूट का संभवत: पहला बड़ा इस्तेमाल था। इस दवा के उत्पादक शेरिंग प्लाउ कारपोरेशन ने प्रयोगों के दौरान इसके महज 46 फीसदी सफल होने तथा इसके असरदायक होने के दावों के संदेह के दायरे में घिरे होने के बावजूद अपने विज्ञापनों में जबर्दस्त प्रचार किया और डायबिटीज के रोगियों के लिए इसे अमरबाण की तरह प्रस्तुत किया। इसका असर यह रहा कि क्लैरिटन अब तक के इतिहास में विज्ञापन के बल पर सबसे ज्यादा बिकने वाली दवा की श्रेणी में आ गई। और यह हुआ इस दवा के विज्ञापन के जरिए दुनिया भर में डायबिटीज के रोगियों में एक विषेश तरह का भय पैदा करना और उसके निदान के लिए क्लैरिटन का उपयोग करने का माहौल बनाना। इसी तरह स्तन कैंसर के लिए जिम्मेदार एक जीन पर किए गए प्रयोग 'बीआरसीए' से जुड़ी कंपनी मॉयरिड जेनेटिक्स ने अपने विज्ञापन में स्तन कैंसर का भय कई गुना ज्यादा कर बताया और दुनिया भर की महिलाओं को कंपनी के क्लीनिकों में जाकर विशेष कैंसर परीक्षण के लिए प्रेरित किया।
इन परीक्षणों की कीमत के रूप में कंपनी ने करोड़ों कमाए लेकिन वह यह साबित तक नहीं कर पाई कि जिन महिलाओं का उसने परीक्षण किया वे स्तर कैंसर के लिए पॉजिटिव थीं या नेगेटिव। ऐसे हर एक परीक्षण की कीमत थी 2800 डालर यानी लगभग सवा लाख रुपए। हालांकि तमाम तकनीकी व वैज्ञानिक कारणों से इस कंपनी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जा सकी पर इससे यह जरूर तय हो गया कि प्रामाणिक तथा विश्‍वसनीय माने जाने वाले प्रयोगशाला के प्रयोग भी अब बाजार में आम लोगों को बेवकूफ बनाकर कंपनियों के मुनाफे के लिए इस्तेमाल होने शरू हो चुके थे। जाहिर है कि इससे वैज्ञानिकों, अनुसंधानों तथा प्रयोगशालाओं की विश्‍सनीयता और नीयत पर सवाल उठ खड़े हुए।आज ऐसी दवाओं की एक लंबी फेहरिस्त मौजूद है जो तमाम तरह की बंदिशों तथा दुष्‍प्रभावों के बावजूद विज्ञापनों के बल पर आम जनता को बेवकूफ बनाकर करोड़ों की कमाई कर रही हैं। साथ ही ऐसे विज्ञापनों की भी एक लंबी फेहरिस्त बनाई जा सकती है जिनमें भय या डर को केंद्र बिंदु बनाकर अपना उत्पाद बेचा जाता है। कुछ की बानगी यूं है,'एलजी के लैट स्क्रीन टीवी का विज्ञापन देखें, जिसमें एक बच्चा स्कूल के बाद सीधे घर न जाकर एक टीवी के शो’रूम के बाहर खड़ा टीवी देख रहा है, और उसकी शिकायत यह है कि मां आंखें खराब होने के भय से उसे टीवी नहीं देखने देती, लेकिन यहीं एलजी का विज्ञापन कहता है कि उनके नए टीवी में आंखे खराब होने का कोई भय नहीं है।' क्या आप अंदाजा लगा सकते हैं कि डॉक्टरों की तमाम हिदायतों और आंखों में तकलीफों के बावजूद इस विज्ञापन के बाद कितने लाख बच्चों ने अपने अभिभावकों से एलजी के टीवी अपने घरों पर लगाने की जिद की होगी। इस विज्ञापन में आखिर ऐसे किस संस्थान, प्रयोगशाला या डॉक्टर का जिक्र किया गया है जो यह दावा करता है कि इस अनूठे टीवी की स्क्रीन निहारने पर आंखें खराब नहीं होतीं।' इसी तरह लड़कियों की शादी के सिलसिले में कई विज्ञापन अपनी हदें पार करते नजर आते हैं। एक विज्ञापन में लड़के वाले कहते हैं कि जिस घर की दीवारों से चूना झड़ता हो, वहां की लड़की की क्या शादी करनी। और जब यही घर बिड़ला व्हाइट सीमेंट से चमकता है और दोनों परिवारों में रिश्‍ता तय हो जाता है। तो क्या आम घरों की लड़कियां जिनके घर झड़ने वाले चूनों से पोते जाते हैं, वे शादी करने लायक नहीं है। हैरानी की बात है कि ऐसे विज्ञापनों पर किसी महिला संगठन ने आवाज नहीं उठाई। इसी तरह सांवली लड़कियों को हमारे टीवी विज्ञापनों के मुताबिक शादी करने का कोई अधिकार नहीं है, कयोंकि हर बार लड़की देखने आने वाले लोग सांवली लड़कियों को नकार देते हैं, लेकिन जब वही लड़कियां फेयर एंड लवली या ऐसे ही अन्य सौंदर्य प्रसाधनों के प्रयोग से 'करिश्‍माई' ढंग से गोरी हो जाती हैं तो उनके लिए लड़कों की लाइन लग जाती है। कुदरती तौर पर मिलने वाले सांवलेपन को हीनभावना का कारण बताने वाले विज्ञापन क्या हमारी लड़कियों में भय पैदा नहीं कर रहे। गौरतलब है कि भारत के संविधान में रंग, जाति या धर्म के आधार पर भेदभाव न करने की बात कही गई है, ऐसे विज्ञापन क्या भारतीय संविधान का खुल्लमखुला उल्लंघन नहीं कर रहे हैं।
ऐसे ही एक विज्ञापन में खेतान खुद को पंखों का बाप बताते हुए कहता है कि जिस घर में पंखों का बाप नहीं है वहां की लड़की से शादी नहीं हो सकती है। अब इसे संयोग ही कहा जा सकता है कि विज्ञापन वाले इस घर में लड़की के पिता नहीं हैं। यानी जिस लड़की का पिता न हो उससे शादी नहीं की जा सकती। ऐसे विवादित विज्ञापनों की सूची काफी लंबी है। ऐसा नहीं है कि ऐसे विज्ञापनों पर किसी की नजर जाती न हो या इनके खिलाफ कोई कदम नहीं उठाया जाता है। कुछ महीनों पहले मुंबई की एक महिला ने बच्चों की सर्वोत्तम देखभाल करने का दावा करने वाली बहुराष्‍ट़ीय कंपनी 'जॉनसन एंड जॉनसन' पर दावा ठोका कि उसके उत्पादों में बच्चों की कोमल त्वचा को नुकसान पहुंचाने वाले तत्व हैं जबकि वह अपने विज्ञापनों में दावा करती है उसके उत्पादों से बच्चों को कोई नुकसान नहीं पहुंचता। इस महिला की षिकायत पर 'खाद्य व औषधि नियंत्रक' ने कंपनी को ड्रग व कॉस्मेंटिक अधिनियम, 1940 की धारा 17 (सी) के तहत नोटिस भेजा कि वह अपने उत्पादों से 'बेबी उत्पाद' का ब्रांड हटा ले क्योंकि उसके उत्पादों में इस तथ्य का जिक्र नहीं है कि उनमें 99 फीसद हल्का पैराफिन नामक द्रव्य पदार्थ है जो बच्चों के लिए नुकसानदायक है। बहरहाल अभी तक तो कंपनी ने अपने उत्पादों से 'बेबी उत्पाद' का ब्रांड नहीं हटाया है और ना ही उसके खिलाफ कोई और कार्रवाई की गई है।
इसकी वजह जाननी कोई खास मुश्किल भी नहीं है। विज्ञापन का बाजार बेहद ताकतवर और पहुंच वाला है, अगर इसमें मीडिया और मनोरंजन व्यवसाय को जोड़ दिया जाए फिर तो बात ही क्या है। अगर आंकड़ों पर नजर डालें तो हम पाएंगे कि प्राइसवाटर कूपर हाउस के अनुसार सन 2008 तक वैश्विक मीडिया तथा मनोरंजन व्यवसाय बढ़कर 1.7 खरब डालर लगभग '85 खरब रुपए' का हो जाएगा। इस कमाई में मांग पर वीडियो, इंटरनेट विज्ञापन, रेडियो पर विज्ञापन, वीडियो खेल आदि का काफी बड़ा हिस्सा होगा। अगर हम केवल विज्ञापन की दुनिया की कमाई देखें तो पाएंगे की यह समूची दुनिया की कमाई का एक प्रतिषत हिस्सा बनाता है। सन 2004 के आंकड़ों के मुताबिक यह राशि 365.8 अरब डालर के करीब पहुंचती है जिसमें अकेले उत्तरी अमेरिका का हिस्सा 167.8 अरब डालर का है। जबकि अफ्रीका, मध्य-पूर्व और भारत जैसे देशों की विज्ञापन से कुल कमाई महज 15.6 अरब डालर की ही है।
जाहिर है कि अरबों, खरबों की कमाई वाले इस धंधे में रुपए से बड़ा कुछ भी नहीं है। अपना माल बेचने के लिए कंपनियां भय और लालच की किन हदों तक जा सकती हैं और कौन से तरीके आजमा सकती हैं इनकी बानगी रोज अपने टीवी चैनलों और अखबारों में देखी जा सकती है। भारत में भी प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का विज्ञापन बाजार करीब 8000 करोड़ रुपए का है। एक ऐसे दौर में जब मीडिया खबरों पर नहीं विज्ञापनों की बैसाखियों पर चल रहा हो और अपनी तमाम नीतियां विज्ञापन कंपनियों को खुष करने पर आधारित कर रहा हो, यह उम्मीद करना कि अखबारों या टीवी चैनलों के जरिए हमें स्वस्थ, ज्ञानवर्धक, मनोरंजक और सामाजिक सरोकार वाली सूचनात्मक खबरें मिलेंगी सचमुच वर्तमान बाजारवादी दौर के साथ ज्यादती होगी। ऐसे दौर में जब उत्पाद जरूरत पर नहीं विज्ञापन के आधार पर खरीदे और बेचे जाते हों, मनोवैज्ञानिक तौर पर हमें यह सोचने को मजबूर कर दिया जाता हो कि हमें इन उत्पादों की जरूरत है, यानी हमारी जिंदगी और खुषियां ही नहीं हमारी सोच पर भी विज्ञापन कंपनियों का कब्जा होता जा रहा हो, बुनियादी जरूरतों, मानवीय संबंधों और बेहतर जीवन के लिए हमें कम से कम मीडिया और विज्ञापन बाजार से उम्मीद का आंचल छुड़ा लेना चाहिए।

विज्ञापन से जुड़े कुछ तथ्य :
अमेरिका के चोटी विज्ञापनदाता
कंपनी खर्च'मिलियन डालर में'
प्रोक्टर एंड गैंबल 2915.10
जनरल मोटर्स 2802.60
टाइम वार्नर्स इंक. 2062.30
एसबीसी 1867.70
डेमलर क्रिसलर 1825.30
फोर्ड मोटर्स 1643.50
वेरीजॉन 1624.90
वाल्ट डिजनी कंपनी 1484.10
जॉनसन एंड जॉनसन 1289.30
न्यूजकॉर्प लिमि. 1129.20
कुल 18744.20
स्रोत: टीएनएस मीडिया इंटेलीजेंस

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