Wednesday, March 29, 2023

 

उनके दिलों में गोडसे, गांधी तो मजबूरी हैं:तुषार गांधी बोले- राहुल को माफी नहीं मांगनी चाहिए, देश को नफरत से बचाना होगा


गांधी फिर विवादों में हैं। राहुल गांधी के साथ महात्मा गांधी भी। राहुल गांधी इसलिए चर्चा में हैं कि उनकी संसद सदस्यता नहीं रही, इससे उनका सियासी करियर लंबे वक्त के लिए रुक सकता है। महात्मा गांधी के चर्चा में रहने की वजह उनकी डिग्री है। 23 मार्च 2023 को जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने एक कार्यक्रम में दावा किया कि महात्मा गांधी के पास लॉ की डिग्री नहीं थी। उनके पास सिर्फ हाईस्कूल का एक डिप्लोमा था।
दैनिक भास्कर ने मानहानि मामले में सजा के बाद राहुल गांधी पर कार्रवाई और महात्मा गांधी को बार-बार विवादों में घसीटने की कोशिशों पर तुषार गांधी से बात की। तुषार गांधी महात्मा गांधी के प्रपौत्र हैं। मनोज सिन्हा के बयान को उन्होंने गलत बताया। तथ्यों के साथ कहा कि गांधीजी के पास लॉ की डिग्री थी। इसके अलावा गांधी पर उठते सवालों, देश में बढ़ रही नफरत और राजनीतिक दुश्मनी के बढ़ते मामलों पर भी खुलकर बात की।

पढ़िए, उन्होंने इन मसलों पर क्या कहा…

  • गांधीजी की हत्या के 76 साल बाद भी कुछ लोग गांधी को पसंद नहीं करते। उनका विरोध करते हैं, अपमान करते हैं। गांधी या गांधी विचार से उन्हें आखिर क्या परेशानी है। 

तुषार गांधी: मैं समझता हूं कि गांधी की आकृति ऐसे लोगों के लिए बहुत डरावनी है। जब गांधी जिंदा थे, तब वे उनके शारीरिक स्वरूप से डरते थे। घबराते थे। क्योंकि जो समर्थन उनको कभी नहीं मिल पाया, वैसा समर्थन बापू ने चुटकी बजाते पा लिया। ऐसा और भी कई लोगों को लगता है। पर उन्हें उसके पीछे का 22 साल का दक्षिण अफ्रीका का परिश्रम, सत्याग्रह और  वहां की तपस्या नहीं दिखती। उन्हें लगता है कि वे भारत आए और एकदम से सब पर कब्जा कर लिया, बाकी सबको किनारे कर दिया। 



ये समझना जरूरी है कि आज की राजनीति, जिसमें सत्ता को पाने के लिए लोगों के कंधों पर चढ़ा जाता है और फिर उनको लात मारकर अलग कर दिया जाता है। ये सत्ता को प्राप्त करने का तरीका, अब लोगों के लिए जायज बन चुका है। पर ये नहीं जानते कि इतिहास में ऐसे कम लोग होंगे जिन्होंने इतना बड़ा नेतृत्व खड़ा किया। जो लोग कुछ भी नहीं थे, ऐसे लोगों के अंतरराष्ट्रीय स्तर तक के नेता बनने के सफर में उनका सहारा बने, उनका साथ दिया। ये सारी बातें ऐसे लोगों को डराती थीं, पहले भी डराती थीं। उनकी हत्या कराने के बाद जब उनको पता चला कि उनका विचार तो और भी ज्यादा प्रभावशाली और ताकतवर हो गया है तो वे उस विचार की हत्या करने के पीछे जुट गए। और इसीलिए 76 साल से उनका यह दुष्प्रचार का दौर चलता आया है। 



  • संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों के गांधी के बारे में विचार सुनकर आपको दुख होता है, चिंता होती है या हंसी आती है।   

तुषार गांधी: मुझे तो हंसी ही आती है। क्योंकि बेचारे हमेशा पकड़े जाते हैं। हम बच्चे थे, तब लोग हमें कहा करते थे कि झूठ बोलो ताे ऐसा बोलो कि पकड़े न जाओ। क्योंकि झूठ बोलने पर पकड़े नहीं जाओगे तो तुम्हारा झूठ सच्चा माना जाएगा। लेकिन अगर झूठ बोलने पर पकड़े गए तो लोगों को पता चलेगा कि तुम झूठे हो। ये बेचारे बड़े-बड़े ओहदों पर बैठे हैं, पर जब भी झूठ बोलते हैं, पकड़े जाते हैं। 

मुझे उनके ऊपर तरस आता हे, क्योंकि वो मेरा काम बहुत आसान कर देते हैं। सत्य को सामने रखने की मेरी क्षमता को बढ़ा देते हैं। मैं बहुत आसानी से सच्चाई को सामने रख सकता हूं। इसलिए एक तरीके से मैं उनका आभारी भी हूं कि वे मेरा काम सरल करवा रहे हैं। वहीं दया भी आती है कि हमेशा ऐसा बोलने वालों के मुंह से मुखौटा निकालना कितना आसान हो जाता है। उनको झूठा साबित करना कितना आसान हो जाता है।  

  • एक तरफ भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की बात हो रही है, इसी मुहीम से जुड़े कुछ लोग गांधी का विरोध भी कर रहे हैं। जबकि गांधी खुद भी धर्म को राजनीति का अहम हिस्सा मानते थे। ऐसे में हिंदू राष्ट्र की अवधारणा में आखिर दिक्कत क्या है।

तुषार गांधी: हिंदुओं का राष्ट्र तो ये हमेशा से रहा है। लेकिन जो लोग हिंदू राष्ट्र की बात कर रहे हैं वे पोलिटिकल हिंदू राष्ट्र की बात कर रहे हैं। इन दोनों में बहुत बड़ा फर्क है। ये भूमि हमेशा से हिंदुओं के राष्ट्र की रही है, इसी भूमि की स्वतंत्रता के लिए बापू लड़े। उन्होंने गैर हिंदूओं के किसी राष्ट्र को बनाने की लड़ाई नहीं लड़ी थी। 



आज हम यह भूल जाते हैं कि हिंदू और हिंदुत्व में बहुत बड़ा फर्क है। और जिनको आप साधु-संत कहते हैं, इनको मैं राजर्षि कहता हूं। पहले के समय में राजाओं के दरबार में बैठने वाले जो भगवाधारी होते थे, ये वैसे लोग हैं। इन्हें साधु या संत नहीं कहना चाहिए। ये अलग लिबास में सत्ता के पुजारी हैं। इसीलिए सत्ता के दरबार में बैठते हैं। पहले के दौर में ब्रह्मर्षि और राजर्षि अलग हुआ करते थे। राजर्षि दरबारी होते थे और जो ब्रह्मर्षि होते थे वो आश्रमों में बैठकर साधना करते थे, लोगों की सेवा करते थे, भला करते थे। ये जो आज सारे हिंदुत्व के संत हैं, ये सभी राजर्षि हैं, दरबारी लोग हैं। केवल उनका लिबास अलग है, लिबास का रंग अलग है, इतना ही फर्क है। वे पोलिटिशियंस हैं, यह समझना हमें बहुत जरूरी है। 

  • ऐसा कहा जाता है कि देश का बंटवारा रोकने के लिए गांधीजी को जितनी कोशिश करनी चाहिए थी, उतनी नहीं की। ऐसे ही आरोप भगत सिंह की फांसी रोकने के बारे में भी लगते हैं। क्या गांधी ऐसे कुछ मामलों में असफल रहे।  इस पर आप कहना चाहेंगे। 

तुषार गांधी: ऐसी धारणाओं के पीछे लोगों का यह मानना है कि बापू दिव्य शक्ति वाले इंसान थे। वो जो भी चाहते, कर सकते थे। उन्होंने हमें स्वतंत्रता दिलवा दीं, तो ये बातें उनके लिए नामुमकिन नहीं हो सकतीं। हम यह नहीं समझते कि वे एक साधारण व्यक्ति थे, पर असाधारण काबिलियत के साथ। 

अगर भगत सिंह की बात करें तो गांधी जी ने नैतिकता के दायरे में रहते हुए उनकी फांसी टालने को लेकर लॉर्ड इरविन के सामने कई बार याचनाएं कीं। गांधी ने सत्याग्रह के दाैरान इरविन से कहा था कि भगत सिंह की फांसी आप रोक दीजिए। ये आपके गुनहगार होंगे, आप उन्हें सजा देना चाहते हैं तो जरूर दीजिए, पर फांसी की सजा वाजिब नहीं है। ये हाेनहार लड़के हैं, इनकी जरूरत भविष्य में हिंदुस्तान को पड़ेगी। इरविन को लिखे अपने कई पत्रों में भी गांधीजी ने इसका जिक्र किया है कि आपसे जो बात मैंने की थी, उसे आप मान लें तो आपकी मेहरबानी होगी। 

पर ये भी सच है कि उन्होंने इस पर कोई जिद नहीं की कि अंग्रेज भगत सिंह को छोड़ ही दें। वरना मैं जो बातें ब्रिटिश सरकार के साथ चल रही हैं, उनको तोड़ दूंगा। इसकी वजह है कि मॉरली ये दो इश्यू लिंक्ड नहीं थे। भगत सिंह की फांसी या उनकी सजा और गांधी-इरविन समझौते के बीच कोई आपसी संबंध नहीं था। ऐसे में एथिकली बापू ने यह नहीं समझा कि मैं ब्लैकमेल करूं। आपको यह भी देखना चाहिए कि बापू ने उपवास का शस्त्र कभी भी ब्लैकमेल करने के लिए नहीं इस्तेमाल किया। केवल दो बार कलकत्ता के दंगे और दिल्ली के दंगे बंद करवाने के लिए उन्होंने उपवास का सहारा लिया था। 

बंटवारे के मामले में भी लोगों का यही मानना है कि गांधी चाहते तो इसे रोक सकते थे। पर यह देखना जरूरी है कि उस वक्त पूरे स्वतंत्रता आंदोलन के समय पूरा देश बापू के साथ खड़ा रहता था, बापू के हर आह्वान पर लोग साथ देते थे। लेकिन जब स्वतंत्रता नजदीक आ गई, लोगों को पता चला कि अब स्वतंत्रता मिलने वाली है, हमारी सत्ता स्थापित होने वाली है, उस दौर में, जब स्वतंत्रता के लिए निगोशिएशन भी चल रहे थे, उसमें बापू के साथ कितने लोग खड़े थे, यह देखने वाली बात है। आजादी से पहले के आखिरी चार साल के दाैर में बापू अकेले और तन्हा ही दिखाई दिए। वे अपने आप को अकेला महसूस भी करते थे, जब लड़ने वाला कोई न हो तो सेनापति कितना ही पराक्रमी क्यों न हो, वह नहीं जीत सकता। 

यह बात हमें समझना जरूरी है कि आज जो लोग ये कहते हैं कि गांधी ने बंटवारा करवाया, या बंटवारा रोका नहीं, इसलिए उन्हें मारना पड़ा, वे लोग भी बंटवारे के खिलाफ कहां खड़े हुए। कोई एक आंदोलन संघियों का दिखा दें, कि जिनको इतना दुख हुआ बंटवारे के कारण, उन्हाेंने कहीं एक चिट्‌ठी भी लिखी हो बंटवारे को रोकने के लिए। अंग्रेज तो उनके रहनुमा थे, वे अंग्रेजों को ही लिखते कि हमें यह तोहफा दीजिए कि हमारे मुल्क का बंटवारा न हो। गोली मारी तो बापू को मारी। यानी हत्या करना उनका मकसद था। ये सारे बहाने जो उन्होंने ढूंढ लिए ये केवल उस हत्या को जायज ठहराने के लिए सोचे हुए बहाने थे।   

  • आपकी किताब लेट्स किल गांधी में आपने लिखा कि हिंदू अतिवादियों ने बंटवारे और देश की जनभावना को न समझने के आरोप में गांधीजी की हत्या की। क्या पुलिस और इंटेलीजेंस की असफलता गांधी की हत्या के लिए जिम्मेदार मानी जा सकती है। तत्कालीन नेहरू-पटेल सरकार को इस पूरे मामले में आप कितना जिम्मेदार मानते हैं। 

तुषार गांधी: हमारे लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि उस वक्त की सरकार को हम दोषी ठहरा सकते हैं, यह बहुत आसान है। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि वह सरकार किस कदर मुसीबतों से घिरी हुई थी। बंटवारा हुआ था, आजादी मिली थी। पूरे तंत्र में कई वरिष्ठ अफसर पाकिस्तान चले गए थे, जो तजुर्बेकार एडमिनिस्ट्रेशन होना चाहिए था, वह नहीं था। मंत्री भी नए-नए बने थे, उन्हें भी सत्ता चलाने का कोई अनुभव नहीं था। पूरा पुलिस तंत्र देखें तो उत्तर भारत में ज्यादातर वरिष्ठ अधिकारी मुसलमान थे, जो पाकिस्तान चले गए थे। ऐसे में दक्षिण भारत से पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों को उत्तर भारत लाया गया। 

अगर हम गांधीजी की हत्या का पूरा घटनाक्रम देखें तो यह जरूर लगता है कि सीआईडी और पुलिस की लापरवाही के कारण खूनियों के लिए बापू का खून करना आसान हो गया था। रेड फोर्ट ट्रायल में जज आत्माचरण ने अपने फैसले में पुलिस पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि अगर मेरे पास पावर होती तो मैं पुलिस को भी आरोपी के कठघरे में खड़ा कर बापू की हत्या का मुकदमा चलाता। इसके बाद कपूर कमीशन भी इसी नतीजे पर पहुंचा कि इस मामले में पुलिस के कुछ अधिकारियों की लापरवाही थी। 

पर हमें यह भी समझना चाहिए कि उसी दौरान गृह मंत्रालय ने एक सर्वे कराया था, जिसमें यह निकला कि पुलिस विभाग में आरएसएस के लोग और उनसे सहानुभूति रखने वालों की घुसपैठ बड़े पैमाने पर और सीनियर लेवल पर हुई थी। तब आजादी को 6 महीने ही हुए थे। ऐसे में दोषारोपण करने से पहले इन तमाम चीजों को भी हमें मद्देनजर रखना चाहिए। महात्मा गांधी की हत्या के मामले में चीफ़ इन्वेस्टिगेशन ऑफ़िसर जमशेद दोराब नागरवाला ने रिटायर होने के बाद कहा था, "मैं इस बात से पूरी तरह सहमत हूँ कि बिना सावरकर की मदद और भागीदारी के बिना गांधी की हत्या की साज़िश कभी सफल नहीं होती"। (लेट्स किल गांधी, पेज-691) इसके बावजूद सावरकर को बेगुनाह क़रार दिया गया था।

  • क्या अब गांधी के नाम से साथ उनके विचारों को भी पूरी तरह भुला देने का वक्त आ गया है। भाजपा के नेता अक्सर कांग्रेस मुक्त भारत बनाने की बात कहते हैं। क्या आपको लगता है कि असल में वे गांधी मुक्त भारत भी बनाना चाहते हैं।  

तुषार गांधी: उनके हिंदू राष्ट्र की कल्पना में गांधी का कोई स्थान नहीं है। भाजपा के लिए मैं जरूर यह कहना चाहूंगा कि वह स्पष्ट बोल देती है। उनके बर्ताव से भी पता चल जाता है कि उनकी मंशा क्या है। जब संसद में बैठे हुए लोग कहते हैं कि राष्ट्रपिता कोई नहीं होता, तो बापू की हर प्रतिमा के आगे सिर झुकाकर खड़ा रहने वाले और अपनी तस्वीर निकलवाने वाले प्रधानमंत्री कुछ नहीं बोलते। हां, ये जरूर कहा कि मुझे बहुत चोट पहुंची, मेरे दिल को बहुत ठेस पहुंची, मुझे दुख हुआ। 

लेकिन जब उनकी मौजूदगी में सभा में ऐसी बातें होती हैं तो उन्होंने कभी सभा का त्याग नहीं किया। यह नहीं कहा कि, मैं यह नहीं सुनूंगा। ये तो उनकी मिलीभगत है ही। मैं नहीं बोलूूंगा, मेरे मन की बात तुम बोल लो। ये उनकी मंशा हमेशा रही है, ये समझना बहुत जरूरी है। उनके दिलों में हमेशा नाथूराम गोडसे ही रहा है और रहेगा। गांधी उनकी मजबूरी है। जब वे सीएम थे, तब वे साबरमती आश्रम कितनी बार गए, दिल्ली जाने के बाद भी नियमित साबरमती आश्रम पहुंच जाते थे। ये प्यार नहीं है, ये उनकी मजबूरी है।  

  • आपके बेटे, बेटी या नाती-पोते जब ऐसी खबरें सुनते हैं तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है। 

तुषार गांधी: जब मैं युवा था, तब भी ये फितरत जोरों पर थी। कभी दलित खड़े होकर बापू को गालियां देते थे, राजघाट पर तोड़फोड़ करते थे, कभी संघी यही करते हैं। कभी कांग्रेसियों के दंभ में भी यही दिखाई देती है। पहले बहुत गुस्सा आता था, दुख भी बहुत होता था। धीरे-धीरे यह समझ आया कि हम एक पब्लिक फिगर के वंशज हैं, ऐसे में ये सब तो होना ही है। 

यह समझना जरूरी है कि हमारे पूर्वज अलग थे और आज उनपर टीका-टिप्पणी करने वाले लोग अलग हैं। ऐसी बातों पर मेरे बच्चों को भी दुख होता है, गुस्सा आता है। उन्हें तो यह भी सहना पड़ता है कि बापू के साथ-साथ उनके बाप को भी गालियां दी जाती हैं। अपमान किया जाता है, तरह-तरह की तोहमतें लगाई जाती हैं। अब वे भी समझने लगे हैं कि उनके पिता भी एक तरह के पब्लिक फिगर बन गए हैं। इसलिए ऐसा तो होने ही वाला है। पहले का समय ऐसा था कि निजी जीवन में सार्वजनिक पहचान का सम्मान किया जाता था, अब ऐसा नहीं रहा। 

  • आपने बेटी का नाम कस्तूरबा के नाम पर कस्तूरी रखा है। क्या नई पीढ़ी गांधी के विचारों को बोझ मानकर भूलना चाहती है या गौरवमयी संस्कृति, परंपरा का हिस्सा मानकर आगे बढ़ाना चाहती है।

तुषार गांधी: अगर मैं अपने बच्चों की बात करूं तो वे दो दौर से गुजरे हैं। पहले दौर में उनको ज्यादा अहसास नहीं था, कि उनके पास कौन सी धरोहर है। वहीं एक दौर ऐसा भी आया कि हम ही क्यों, हमसे ही आशा क्यूं रखी जाए? अब यह दौर भी आया है कि वे समझने लगे हैं कि यह जिम्मेदारी है और इसे निभाना है। वे अपने तरीके से इसे निभाते हैं। मैंने कभी उन पर यह दबाव नहीं डाला कि उन्हें गांधी के वंशज के तौर पर रहना पड़ेगा। वे चाहें तो कर सकते हैं, ना चाहें तो कोई बात नहीं। मैंने भी अपना जीवन अपनी शर्तों पर जिया है। लोगों की अपेक्षाओं के मुताबिक नहीं जिया है। 

कई बार मैं जींस और टी शर्ट पहनकर घूमता हूं तो लोग आकर कहते हैं कि खादी भी पहना करो। अक्सर कार्यक्रमों में जाने पर लोग ऐसा कहते हैं। मुझे लगता है कि जब मुझे लगेगा, मैं खादी पहनूंगा। पर केवल किसी कार्यक्रम के लिए खादी नहीं पहनूंगा, क्योंकि वह दंभ माना जाएगा। मैं बच्चों को भी किसी तरह का मुखौटा लगाने पर मजबूर नहीं करता। 

जहां तक मेरी बेटी का नाम कस्तूरी रखने की बात है, तो हमारे परिवार में मोहन के नाम से वंशज हैं राजमोहन गांधी को उनका नाम दिया गया था। पर कस्तूरबा का नाम किसी ने नहीं लिया। जब बेटी हुई तो मैंने सोचा कि उसका नाम कस्तूरी रखूं। ताकि कस्तूरबा की भी याद जिंदा रहे। 

  • अगर आज की राजनीति की बात करें तो इसे आप 47 में हो रही राजनीतिक उथलपुथल से कितनी अलग मानते हैं। देश के विकास के साथ राजनीति का भी विकास हुआ है या स्थितियां बदतर हुई हैं। 

तुषार गांधी: अगर हम विकास की बात करें तो लोकतंत्र आज तानाशाही की ओर बढ़ रहा है। पहले भी ऐसे प्रयास किए थे। इमरजेंसी के दौरान इंदिरा गांधी ने ऐसा प्रयास किया था। लेकिन उनके जो लोकतांत्रिक आदर्श थे, उनके लोकतांत्रिक संस्कार थे, उनके कारण उन्हें कहीं न कहीं जाकर अपनी गलती का अहसास हुआ। लोगों के दबाव का भी असर रहा होगा, पर उन्होंने लोकतंत्र बहाल किया। 

आज बहुत ही खतरनाक तरीके से हम तानाशाही की ओर बढ़ रहे हैंं। चोला पहना हुआ है लोकतंत्र, लोकशाही का। लोगों की सत्ता का, लेकिन तंत्र पूरा तानाशाही की तर्ज पर चलाया जा रहा है। ये आज की सबसे बड़ी चुनौती है। सन 47 से भी बड़ी चुनौती आज है। उस वक्त तो हमने परतंत्रता की जगह स्वतंत्रता हासिल की थी, पर आज तो सब मायने में हम स्वतंत्र हैं। इसे लोकतांत्रिक राज कहा जाता है। आज इस लोकतंत्र को खोखला किया जा रहा है। ये लड़ाई बहुत ज्यादा खतरनाक और कठिन लड़ाई है। क्योंकि गैरों से लड़ना बहुत आसान होता है, पर अपनों से लड़ना बहुत मुश्किल होता है।  

  • गांधी आज भी तमाम सरकारी योजनाओं के नामों में हैं, हर विदेशी मेहमान को दिल्ली आते ही गांधी समाधि पर ले जाया जाता है। यानी एक ओर पदों पर बैठे लोग गांधी का विरोध करते हैं, इसके बाद भी आधिकारिक तौर पर गांधी को देश का अभिन्न हिस्सा माना जाता है। आखिर गांधी को मानने की ऐसी क्या मजबूरी है।

तुषार गांधी: अगर गांधी नहीं तो भारत की पहचान किस चीज से करेंगे। यही अंतरराष्ट्रीय तौर पर भी भारत की अविभाज्य पहचान है। आप कहीं भी जाएं तो हिंदुस्तान और गांधी का नाम एक साथ ही लिया जाता है। यह बात सरकार भी जानती है। यह उनकी मजबूरी है। राजघाट पर जाना तो एक औपचारिकता हो गई है, उसके कोई मायने नहीं हैं। मैं समझता हूं कि यह उतना ही बेमतलब है जिनका उच्च पदों पर बैठे लोग बार-बार झूठ का प्रचार करते हैं, या उनकी मानहानि का प्रयास करते हैं। हालांकि उनके प्रयास भी निरर्थक हैं, क्योंकि वे बापू की छवि को उजाड़ नहीं सकते, तोड़ नहीं सकते। वह उतनी ही रहेगी, वैसी ही रहेगी। उनसे जुड़े कुछ लोग भले ही उनका समर्थन करते हों, पर ऐसा भी बहुत बड़ा वर्ग है जो उन्हें समझकर उनको रिजेक्ट करता है। 

आज के जमाने में जो बापू की भक्ति का आडंबर है, वह निरर्थक है, और बापू की बदमानी और तिरस्कार की जो प्रवृत्ति चल रही है वह भी निरर्थक ही साबित होगी। पर इसका यह मतलब नहीं है कि हम आश्वस्त होकर बैठ जाएं कि बापू को कोई हानि नहीं पहुंचा सकता।  क्योंकि धीरे-धीरे बापू का तिरस्कार करने वालों की संख्या इस देश में बढ़ती जा रही है। इससे इस देश के अस्तित्व को खतरा है। अगर गांधी नहीं रहे तो जिस परिकल्पना से देश को आजादी दिलाई गई थी, वैसा बचाए रखना मुश्किल होगा। 

  • आप राहुल गांधी के साथ भारत जोड़ो यात्रा में शामिल हुए थे। एक लीडर के तौर पर राहुल और पार्टी के तौर पर कांग्रेस का आप क्या भविष्य देखते हैं। 

तुषार गांधी: राहुल गांधी के बारे में मेरे मन मे काफी सम्मान है, आदर है। इसीलिए मैं भारत जोड़ो यात्रा में उनके साथ गया था। मैं पिछले 4 से 8 सालों की बात करूंगा। अगर कोई एक भरोसे लायक आवाज राजनीति में उठ रही है तो वह राहुल गांधी की है। उन्होंने जो मुद्दे उठाए, बार--बार, कई बार, आज साबित होता है कि उनकी चिंता सही थी। आज उसको नजरअंदाज करने का परिणाम हम भुगत रहे हैं। 



मुझे लगता है कि उन्होंने खुद को काफी बदला है, उन्होंने एक अलग तरह का नेतृत्व करने के लिए काफी मेहनत की है। लेकिन कांग्रेस के नेतृत्व को अपने-आप को सुधारना होगा। कांग्रेस अभी भी जितनी चाहिए, उतनी कार्यरत नहीं है। वो मुद्दे नहीं समझ पा रही है, अपनी जिम्मेदारी नहीं समझ पा रही है। नेता कितना भी प्रखर क्यों न हो, जब तक उसके पास एक सजग तंत्र नहीं होता है, उसका कोई मतलब नहीं रहता है। 

भारत जोड़ाे यात्रा में राहुल ने जो गुडविल कमाया था, उसे व्यर्थ होने में समय नहीं लगेगा। पर ऐसा दिखता नहीं है कि कांग्रेस एक पार्टी के तौर पर इस यात्रा में मिले समर्थन का फायदा उठाने के लिए कुछ कर रही हो। ये चिंता का विषय है। मुझे लगता है कि राहुल भी यह जानते हैं कि कहीं न कहीं वे खोखले तंत्र के ऊपर बैठे हुए हैं। जरूरत इस बात की है कि वे रेडिकल सर्जरी करें। कई बार मरीज को बचाने के लिए उसका एक अंग काटकर फेंक देना पड़ता है। कांग्रेस में आज ऐसा करने की बहुत जरूरत है।  

  • राहुल गांधी ने कोर्ट में माफी नहीं मांगी, उन्हें सजा हो गई, उनकी सांसदी चली गई। राहुल ने कहा, वे सावरकर नहीं गांधी हैं और गांधी माफी नहीं मांगते। आपको क्या लगता है, राहुल को माफी मांगनी चाहिए थी या नहीं।

तुषार गांधी: नहीं, क्योंकि अगर वे माफी मांगते तो यह साबित होता कि उन्होंने जो कहा था वह सत्य नहीं था। मुझे नहीं लगता कि उन्होंने जो भी कहा था, उसमें कहीं पर भी कोई घृणा पात्र या कोई टीका करने योग्य बात थी।  भाजपा उस पर जातिवादी रंग लगाना चाहती है, पर राहुल के बयान में किसी जाति का अपमान या किसी जाति पर अटैक करने की फितरत नहीं थी। उन्होंने इंडिविजुअल्स को सिंगल आउट करके कहा था और पूरी दुनिया जानती है कि जिनके बारे में बात की गई थी, उनकी क्या फितरत रही थी। 

चाहे वे बड़ी अदालत में भी दोषी साबित हो जाएं, मुझे लगता है कि राहुल को माफी तो नहीं ही मांगनी चाहिए। क्योंकि अगर अब माफी मांग ली तो यह हो जाएगा कि वे बेबुनियाद बातें करते हैं, मनगढ़ंत बातें करते हैं और उनकी बातों में जरा भी सत्यता नहीं है। जब उन्होंने यह कहा कि वे सावरकर नहीं है, गांधी हैं, और गांधी माफी नहीं मांगते, तो यह तो इतिहास प्रमाणित तथ्य है कि सावरकर ने माफी मांगकर अपनी रिहाई करवाई थी। उन्होंने कोई आक्षेप नहीं लगाया या मनगढ़ंत बात नहीं की, जैसी बापू की डिग्रियों के बारे में की जाती है।  

  • क्या आपका सक्रिय राजनीति से जुड़ने का कोई विचार है। इसका संदर्भ यह है कि गांधी जी 1924 में कांग्रेस अध्यक्ष बनाए गए, तब उनके साथ मोतीलाल, जवाहरलाल नेहरू, लाला लाजपत राय, राजगोपालचारी, एनी बिसेंट, सरोजिनी नायडू, मदन मोहन मालवीय, अबुल कलाम आजाद, राजेन्द्र प्रसाद, वल्लभभाई पटेल जैसे बड़े नाम थे। आज कांग्रेस सबसे बड़े संकट के दौर से गुजर रही है। ऐसे में गांधी के वारिस के तौर पर कांग्रेस को बचाने में आप अपनी क्या भूमिका देखते हैं। 

तुषार गांधी: मेरे लिए आज देश को बचाना ज्यादा अहम है। मैं इलेक्टोरल पॉलिटिक्स में नहीं जाऊंगा, पर एक्टिव पॉलिटिक्स में रहूंगा। इन दोनों का फर्क समझना जरूरी है। मैं एक्टिविज्म करके सिविल सोसायटी की जो मदद कर सकता हूं, भारत को बचाए रखने में, उसमें किसी के साथ भी हाथ मिलाने में मुझे कोई दिक्कत नहीं है। 

मैं जिस तरह का काम कर रहा हूं, उसमें पार्टी से जुड़ने का मतलब है चुनावी राजनीति में काम करना। पर मुझे चुनावी राजनीति नहीं करनी, चुनावी फायदा भी नहीं उठाना। अगर मेरे काम से कांग्रेस का फायदा होता है, तो उसमें मुझे कोई हर्ज नहीं है। क्योंकि मैंने अपना लक्ष्य तय करके रखा है, वह है संघ की राजनीति को हराना। संघ की राजनीति के बारे में लोगों को अवगत कराना। घृणा की राजनीति का जो दौर उन्होंने चलाया है, उसके खिलाफ आवाज उठाना। उसके लिए अगर मुझे कांग्रेस के साथ खड़ा रहना पड़े या वामपंथियों के साथ या फिर सोशलिस्ट के साथ खड़ा होना पड़े ताे मैं खड़ा जरूर होऊंगा। जो भी सांप्रदायिक ताकतों के खिलाफ खड़े हैं, उनके साथ मैं खड़ा होने को तैयार हूं। चूंकि मुझे राजनीति से कोई निजी फायदा नहीं उठाना है इसलिए किसी पार्टी से जुड़ने की आवश्यकता भी नहीं है।   

  • गांधी जी की राजनीति में सत्य, अहिंसा, सत्याग्रह, सर्वोदय, स्वराज और स्वदेशी सबसे महत्वपूर्ण थे। उनके लिए राजनीतिक कार्रवाई की बुनियाद ही अहिंसा पर टिकी थी। उनके लिए राजनीति का लक्ष्य सत्ता हासिल करना नहीं था। आज की राजनीति में उनके ये नैतिक मूल्य कहां जगह बना पा रहे हैं।

तुषार गांधी: जैसे ही आप चुनावी राजनीति में चले जाते हैं, तो नैतिकता वगैरा सब बेमायने हो जाते हैं। क्योंकि आपका कर्तव्य बन जाता है चुनावी सफलता। इसके लिए जो भी समझौते करने पड़ते हैं, वे सब जायज हो जाते हैं। हमारी जो मोरेलिटी है उसे चुनावी राजनीति का मापदंड बनाना गलत होगा। चुनावी राजनीति में सफलता के लिए साम, दाम, दंड, भेद जब जायज हो जाता है। 

बापू के लिए सिद्धांत सबसे अहम होते थे, इसलिए वे कभी चुनावी राजनीति में नहीं आए। ऐसे में, जो लोग चुनावी राजनीति करते हैं, उन्हें बापू के मापदंड पर तौलना और उनपर टीकी-टिप्पणी करना शायद नाइंसाफी है। चुनावी राजनीति में समझौते करने ही पड़ते हैं। वैसी शुद्ध राजनीति आज के दौर में कहीं भी नहीं दिखेगी। मैने पहले समाजवादी और कांग्रेस के प्रत्याशी के तौर पर चुनाव भी लड़ा है। मुझे पता है कि ऐसे में अपने आदर्शों से क्या-क्या समझौते करने पड़ते हैं। उसी कारण डर भी लगा था कि चुनावी राजनीति, सत्ता की राजनीति के साथ आने वाली सारी चीजों को अपना मान लूंगा, और अपना लूंगा। क्या यही मेरी फितरत हो जाएगी। इसी कारण से मैं चुनावी राजनीति से दूर हाे गया। 

  • क्या आपको लगता है कि गांधी विचारों से जुड़ी संस्थाओं को राजनीतिक, सामाजिक व आर्थिक मुद्दों पर और सक्रिय होना चाहिए। खासकर 74 के जेपी आंदोलन में सर्वाेदयी कार्यकर्ताओं की सक्रिय भूमिका को देखते हुए आज के माहौल में आप उनकी क्या भूमिका देखते हैं। 

तुषार गांधी: गांधीवादी संस्थाओं की हालत वैसी ही हो गई है, जैसी कांग्रेस की हालत है। आंतरिक राजनीति ओर आंतरिक सत्ता संघर्षो में सारी संस्थाएं बंटी हुई हैं। मुझे दुख होता है यह कहने में किस ये सारी संस्थाएं निकम्मी हो गई हैं। कोई मतलब नहीं रह गया इनका। कई गांधीवादी संस्थाओं में संघियाें की घुसपैठ हो गई है और उनका ही कब्जा भी हो गया है। फिर भी, कुछ कथित गांधीवादी हैं जो संस्थाओं पर कब्जा करके बैठे हुए हैं, वे बिल्कुल बेध्यान होकर, केवल अपनी सत्ता, अपनी कुर्सी टिकाए रखने की होड़ में पड़े हुए हैं। अब ये तमाशा पब्लिक हो गया है, पहले ये अंदरूनी मामले होते थे। आजकल तो खुलेआम झगड़े हाेते हैं। सोशल मीडिया पर सर्व सेवा संघ और सेवाग्राम के बखेड़े हर दिन देखे जा सकते हैं। 

ऐसे में यही सच है वे लोग उन सवालों पर बिल्कुल सक्रिय नहीं हैं जो भारत और भारत के लोगों से जुड़े हैं। अगर सर्व सेवा संघ की ही बात करें तो भूदान आंदोलन के बाद भूदान में मिली जमीनों का उन्हें कस्टोडियन बनाया गया था। आज किसानों की समस्या इतनी गहरी और बड़ी है कि किसानों के अस्तित्व पर बात आ गई है। दो साल किसानों का आंदोलन चला, आज भी किसान असंतुष्ट है। उस आंदोलन में सर्व सेवा संघ के लोग कहीं भी नहीं दिखे। 

भूदान की जमीनें किसानों के लिए थीं, पर उनका उपयोग किसानों के लिए हो रहा हो, ऐसा भी नहीं दिखता।
आप साबरमती आश्रम की ही बात करें। संघी सरकार के लिए कितना आसान हो गया है साबरमती आश्रम को कैप्चर करना। कुछ ही सालों में ये साबरमती आश्रम की तस्वीर ऐसी बदल देंगे कि उसमें बापू कहीं दिखाई भी नहीं देंगे। या जो गांधी उन्हें अनुकूल लगता है, उसे ही दिखाएंगे। 

आजादी से अब तक आश्रम के ट्रस्टियों ने अपने को सरकार के तंत्र और प्रभाव से सुरक्षित करके रखा था। कई बार आश्रम का जीर्णाद्धार हुआ, उसमें म्यूजियम बना। पूरा पैसा सरकार ने लगाया, लेकिन पूरी जवाबदेही ट्रस्ट के ही पास रही। पहली बार ऐसा हुआ कि सरकार ने कहा, आप सब हट जाओ, आपकी जरूरत नहीं है। हम अपने तरीक से फैसला करेंगे, काम करेंगे। सारे ट्रस्टी हाथ पर हाथ धरे बैठ गए। आखिर में अपनी सत्ता बचाने के लिए समर्थन भी कर दिया। 

ऐसी खोखली और पंगु संस्थाओं से यह आशा रखना कि वे देश के मामलों में आगे आएं और लड़ें, यह पूरी तरह निरर्थक है। अब न तो सर्वाेदय, न सर्व सेवा संघ, न ही किसी भी गांधीवादी संस्था का अस्तित्व ही इस लायक नहीं है कि वह सामाजिक प्रश्नों, राजनीतिक प्रश्नों, देश के प्रश्नों पर काम कर सकेंगी। वहां झूठबाजी चल रही है, अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए झूठ का प्रयोग बेशर्मी से किया जा रहा है। मुझे नहीं लगता कि उनसे ऐसी कोई उम्मीद रखनी चाहिए कि जेपी के आंदोलन के समय जिस तरह सर्वोदय से जुड़े लोग आंदोलित हुए थे, वैसे अब हो पाएंगे। अब वैसे लोग ही नहीं रहे। 

  • आप 2047 के लिए कैसे भारत की कल्पना करते हें। वह भारत गांधी के सपनों के भारत से कितना और किन मायनों में अलग होगा। 

तुषार गांधी: अगर आज के संदर्भ में 2047 की बात करूं तो मुझे नहीं लगता कि किसी भी हालत में, जो भारत बनेगा वह बापू के सपनों का या हमारे रचनाकारों के सपनों का होगा। जिसे हम आइडिया ऑफ इंडिया कहते हैं, वैसा होगा। क्योकि उसके खिलाफ खड़ी ताकतें आज सफल हो गई हैं। जिस दिशा में वे भारत को ले जा रहे हैं, 47 तक वह भारत भारत नहीं रहेगा। मुझे इस बात की चिंता है और इस बात का रंज भी है कि उसके बनने में मेरी निष्फलता का वह एक प्रतीक होगा। मेरी यानी, मेरे जैसी विचारधारा मानने वाले। जिस चीज में मेरी आस्था है, उस आस्था की निष्फलता का वह प्रतीक बनकर उभरेगा।   

  • आप एक्टर हैं, आप राइटर हैं, आपने गांधी की हत्या पर काफी शोध कर लेट्स किल गांधी, किताब लिखी। क्या अब कोई ऐसी किताब लिखने का विचार नहीं आता जिसका शीर्षक लेट्‌स रिवाइव गांधी जैसा हो। या लेट्स किल गांधी थॉट्स जैसा विचार तो नहीं आता। 

तुषार गांधी: मैंने उसके बाद लॉस्ट डाॅयरी ऑफ, कस्तूर माय बा लिखा। क्योंकि कस्तूर को हमने भुला दिया था। एक व्यक्ति के रूप में भुला दिया था, गांधी की पत्नी के रूप में उन्हें हम याद करते थे। जब मुझे बा की लिखी हुई एक डायरी प्राप्त हुई तो यह किताब लिखी। हम भी पितृसत्ता के इतने प्रभाव में थे कि बा को जो स्थान मिलना चाहिए था, वह दिया ही नहीं। अपनी किताब से कस्तूर के किरदार पर जो रोशनी मैं डाल सका, उसका मुझे नाज है। अभी मैं एक किताब लिख रहा हूं, विभाजन की त्रासदी के ऊपर। यह भी एक वुमन सेंट्रिक किताब है। 

मेरी दादी की एक सहेली थी कमला बेन पटेल। उन्होंने विभाजन के दौरान जिन औरतों और बच्चों को अगवा कर लिया गया था, सीमा के दोनों ओर, उन्हें उनके घर तक पहुंचाने का काम किया था। ऐसी ही और महिलाओं की कहानियां ढूंढकर इस पर किताब लिख रहा हूं। क्योंकि आज पार्टिशन को लेकर जिस तरह घृणा की राजनीति को बढ़ावा दिया जा रहा है, प्रधानमंत्री ने दो साल पहले ऐलान किया कि 14 अगस्त अब से पार्टिशन हॉरर रिमेंबर डे के तौर पर मनाया जाएगा। इसका मकसद पार्टिशन की घिनौनी याद को जागृत रखकर आज के भारत में घृणा का विष फैलाना है। ऐसे में मैं अपनी किताब में जो भी अच्छा काम हुआ, मानवता का काम हुआ, भले ही छोटे पैमाने पर हुआ हो, उसे रखा है। कुछ जिंदगियां संवरीं, कुछ संभलीं, कुछ तो नई आशा मिली। 

मुझे लगता है कि अब घृणा के खिलाफ एक मुहीम चलाना बहुत जरूरी है। पिछले साल मुसलिमों के खिलाफ जब देश भर में एक माहौल बन रहा था, मैंने मुंबई में एक बैठक रखी थी इसमें कहा कि जैसे 42 में अंग्रेजों भारत छोड़ो का आंदोलन किया गया था, आज उसी तर्ज पर नफरतों भारत छोड़ो आंदोलन की जरूरत है। आज भारत को नफरत की राजनीति से सबसे बड़ा खतरा है। 

आज नफरत को सामान्य कर दिया गया है। आज कोई भी घटना हो तो हम विक्टिम का धर्म देखते हैं, जात देखते हैं। फिर खुद को मना लेते हैं कि ठीक है। वो मुसलमान था या वो दलित था, उसके साथ ऐसा हुआ तो ठीक है। ये इसलिए हुआ है कि हमारे दिलों में नफरत घर कर चुकी है। नफरत के चलते हमारी मानवता कुंठित हो चुकी है, मौत के घाट पर पड़ी हुई है। अगर यह हुआ तो भारत का अस्तित्व असंभव हो जाएगा। अगर भारत को बचाना है तो नफरत के खिलाफ जंग लड़नी पड़ेगी। 

  • गांधी के विचारों को भारत से ज्यादा दुनिया भर के बड़े नेता आज ज्यादा प्रासंगिक मानते हैं। और आज दुनिया में जिस तरह देशों के बीच युद्ध, अविश्वास और हिंसा का दौर जारी है, उसे देखते हुए गांधी की वर्तमान और भविष्य की प्रासंगिकता पर आप क्या सोचते हैं। 

तुषार गांधी: देखिए, हमारी संस्कृति मूर्ति पूजक संस्कृति रही है। हमने भगवानों को भी महज मूर्ति के स्वरूप में रख दिया और मूर्ति की हम पूजा करते हैं। जिस वजह से वे भगवान स्वरूप बने, पूज्य स्वरूप बने उन सारे तत्वों को, गुणों को हम भुलाते चले गए। वही चीज हमने बापू के साथ भी की। विदेशों में, जहां सिद्धांतों को माना जाता है और सिद्धांतों के कारण लोगों को आदर्श कहा जाता है, वहां लाजमी है कि बापू की जो कार्यपद्धति थी, उनकी मान्यताएं थीं, उनके ऊपर काम किया जाए और उन्हें अपनाकर आज के प्रश्नों को सुलझाने का प्रयास करें। 

आज अगर हम क्लाइमेट चेंज या ग्लोबल वॉर्मिंग देखें तो वह कुदरत के खिलाफ हमारी हिंसात्मक जीवन शैली का ही नतीजा है। इससे बचने के लिए हमें गांधी की अहिंसा या बुद्ध की अहिंसा के तत्व को अपने जीवन में उतारना होगा। इसके बगैर हमारा अस्तित्व नामुमकिन हो जाएगा। जब तक उसकी अहमियत रहती है, तब तक उसको सबसे ज्यादा सफलतापूर्वक इस्तेमाल करने वाले व्यक्ति को हम नहीं भूलते। इसलिए गांधी का महत्व आज है कल भी रहेगा। यह व्यक्ति का नहीं, उसके विचारों और उसके कर्म का महत्व है। 



Thursday, March 2, 2023

लोकतंत्र बचाने की सुप्रीम कोर्ट की बेचैनी...



 पहले, दो खबरें पढ़िए…

1. देश की सर्वाेच्च अदालत ने एक बेहद अहम और देश के चुनावी भविष्य की दिशा तय करने वाले फैसले में कहा है कि अब केंद्रीय चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का अधिकार प्रधानमंत्री, नेता प्रतिपक्ष (ऐसा न होने की स्थिति में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता) और सीजेआई की समिति को होगा। 

2. देश के तीन उत्तर-पूर्वी राज्यों नगालैंड, मेघालय और त्रिपुरा में 2 मार्च को मतगणना के बाद नतीजे आ गए। यहां बात नगालैंड की करनी है, क्योंकि नगालैंड में भाजपा और सहयोगी दलों को बहुमत मिला है। वे दोबारा सरकार बनाने जा रहे हैं। नगालैंड में 27 फरवरी को मतदान हुए थे। इससे एक दिन पहले नगालैंड के कई गांवों में हुई बैठकों के बाद यह फैसला लिया गया कि वोटिंग में सभी लोग वोट डालने नहीं जाएंगे। परिवार से केवल एक ही शख्स बाकी सभी के वोट डाल देगा। और 27 फरवरी को वाकई ऐसा ही हुआ। 

अब हम बात करते हैं सर्वाेच्च अदालत #supremeCourt के फैसले और उसके संभावित असर पर। पहली बात तो यह कि यह बेहद अहम फैसला फरवरी 2025 के बाद ही लागू होगा, जब वर्तमान केंद्रीय चुनाव आयुक्त राजीव कुमार रिटायर होंगे। क्योंकि यह फैसला वर्तमान चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति को प्रभावित नहीं करता है। यानी, जब तक यह फैसला लागू होगा तब तक बहुत से राज्यों के विधानसभा और 2024 का लोकसभा चुनाव हो चुका होगा। इसी साल मिजोरम और कर्नाटक में चुनाव होने हैं। अगले साल मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, आंधप्रदेश, हरियाणा समेत 10 राज्यों में विधानसभा चुनाव होंगे। 2025 में दिल्ली, बिहार और झारखंड में चुनाव हैं। पर दिल्ली और झारखंड में फरवरी से पहले चुनाव होने हैं, यानी केवल बिहार ही ऐसा पहला राज्य होगा जहां नये केंद्रीय चुनाव आयुक्त के तहत चुनाव कराया जाएगा। 

अब सवाल यह उठता है कि सुप्रीम कोर्ट को आखिर चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर इतना अहम फैसला क्यों करना पड़ा। वे कौन सी परिस्थितियां या प्रश्न थे जिनके उत्तर ढूंढने के लिए हमें सुप्रीम कोर्ट के फैसले की कुछ अहम टिप्पणियों को पढ़ना और समझना होगा। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने चुनाव आयुक्तों की स्वतंत्रता, धन शक्ति के उदय और राजनीति में अपराधीकरण के अलावा भी बहुत अहम और तल्ख टिप्पणियां की हैं। इनमें कुछ टिप्पणियां ही इस पूरे मसले को जानने, समझने के लिए पर्याप्त होंगी। 

कोर्ट ने कहा कि 

  • धन बल की भूमिका और राजनीति के अपराधीकरण में भारी उछाल आया है। हालत यह है कि मीडिया का एक बड़ा वर्ग अपनी मूल भूमिका से अलग हो गया और पक्षपातपूर्ण हो गया है। 

  • कोई भी मौजूदा कानून स्थायी नहीं हो सकता, खासकर नियुक्तियों के मामले में कार्यपालिका के पूर्ण अधिकार को देखते हुए। यह भी कहा जा सकता है कि राजनीतिक दलों के पास नया कानून न तलाश करने का कारण होगा, जो साफ दिख रहा है। किसी भी सत्तारूढ़ पार्टी में एक सेवा आयोग के माध्यम से सत्ता में बने रहने की अतृप्त इच्छा होगी।

  • चुनाव आयोग को स्वतंत्र होना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि वह स्वतंत्र होने का दावा करे लेकिन काम अनुचित तरीके से करे। अगर किसी व्यक्ति के मन में सरकार के प्रति कृतज्ञता की भावना रहेगी तो वह कभी भी स्वतंत्र रूप से सोच नहीं सकता। एक स्वतंत्र व्यक्ति कभी भी सत्ता का गुलाम बनकर नहीं रह सकता। 

  • स्वतंत्रता आखिर क्या है? कभी भी योग्यता को भय से बांधकर नहीं रखा जा सकता। योग्यता को हमेशा स्वतंत्रता के पैमाने से ही आंका जाना चाहिए। लोकतंत्र की रक्षा के लिए एक आम आदमी ईमानदार व्यक्ति की ओर ही देखेगा। 

  • एक चुनाव आयोग जो कानून के शासन की गारंटी नहीं देता, वह लोकतंत्र के खिलाफ है। अगर वह अपनी शक्तियों के व्यापक स्पेक्ट्रम को अवैध रूप से या असंवैधानिक रूप से प्रयोग करता है तो इसका राजनीतिक दलों के नतीजों पर असर पड़ता है। 

  • केवल नतीजे तक पहुंचा देना कभी भी उसके लिए जिम्मेदार गलत साधनों को सही नहीं ठहरा सकता। लोकतंत्र तभी सफल हो सकता है, जब सभी हितकारण चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता बनाए रखने के लिए काम करें। 

  • नियुक्ति की शक्तियों का दुरुपयोग किया जा सकता है। यह देश भर में बड़े पैमाने पर हो सकता है। राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों का भाग्य चुनाव आयोग के हाथों में है।ऐसे तमाम मामलों को नियंत्रित करने वाले महत्वपूर्ण निर्णय उनके द्वारा ही लिए जाते हैं। 

  • लोकतंत्र तभी प्राप्त किया जा सकता है जब सत्ताधारी दल इसे अक्षरश: कायम रखने का प्रयास करें। 

  • एक पर्याप्त और उदार लोकतंत्र की पहचान को ध्यान में रखना चाहिए। लोकतंत्र जटिल रूप से लोगों की शक्ति से जुड़ा हुआ है। मतपत्र की शक्ति सर्वोच्च है, जो सबसे शक्तिशाली दलों को भी अपदस्थ करने में सक्षम है।

कोर्ट के अहम फैसले के ये नौ बिंदु या टिप्पणियां नौरत्नों की तरह हैं। इनमें से हर एक टिप्पणी को मौजूदा हालत पर सुप्रीम कोर्ट की चिंता के साथ ही चुनाव आयोग की शक्तियों और देश में लोकतंत्र बरकरार रखने की उसकी बेचैनी के संदर्भ में देखने की जरूरत है। खासकर कोर्ट का यह कहना कि देश के राजनीतिक दल ऐसे किसी नये कानून की तलाश जानबूझकर नहीं कर रहे क्योंकि इससे माैजूदा व्यवस्था के चलते रहने से सत्ता में बने रहने की उनकी लालसा पूरी होती है। कोर्ट जहां यह बात बिना किसी लाग-लपेट के कहता है कि कानून के शासन की गारंटी नहीं देने वाला चुनाव आयोग लाेकतंत्र के खिलाफ है, वहीं वह बेहद भावनात्मक और अकादमिक ढंग से यह भी बताता है कि किसी भी योग्यता को इसी पैमाने से आंका जा सकता है कि वह कितना स्वतंत्र है। और अंत इस बात से कि मतपत्र ही वह सर्वोच्च शक्ति है जो सबसे शक्तिशाली दलों को भी अपदस्थ करने में सक्षम है। 

जाहिर है कि सुप्रीम कोर्ट देश में हो रहे चुनावों पर उठने वाले प्रश्नों से बेहद चिंतित है। उसकी चिंता महज एक आयोग की अध्यक्ष या उसके सदस्यों की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। उसकी चिंता इससे कहीं ज्यादा व्यापक है। सुप्रीम कोर्ट देश में लाेकतंत्र को बरकरार रखने के रास्ते में आने वाली हर बाधा को दूर करना चाहता है। वह इसके लिए राजनीतिक दलों को ही नहीं, सत्तारूढ़ दलों की कृतज्ञता के तले सही-गलत फैसले करने वाले आयोग को और अपनी मूल भूमिका से अलग होते जा रहे मीडिया को भी आड़े हाथों लेने से नहीं हिचकता। 

पर सवाल यह है कि क्या वास्तव में वह हो पाएगा जो इस अहम फैसले के पीछे सुप्रीम कोर्ट की मंशा है। चुनाव आयोग के कामकाज की पारदर्शिता को लेकर सुप्रीम कोर्ट में 2018 में कई याचिकाएं दायर की गयी थीं। कोर्ट ने इन तमाम याचिकाओं को क्लब कर पांच जजों की संविधान पीठ को रेफर कर दिया था। चार साल बाद 18 नवंबर 2022 को संविधान पीठ ने सुनवाई शुरू की थी। सुनवाई के दौरान भी संविधान पीठ ने सरकार से कई गंभीर सवाल किए थे। कोर्ट ने यह भी कह दिया था कि हर सरकार अपनी हां में हां मिलाने वाले व्यक्ति को मुख्य चुनाव आयुक्त या चुनाव आयुक्त नियुक्त करती है। कोर्ट ने यह भी कहा था देश को टीएन शेषन जैसे मुख्य चुनाव आयुक्त की ज़रूरत है। 

ऐसे में, जहां एक ओर नगालैंड जैसे राज्य में जीबी परंपरा के तहत एक ही व्यक्ति पूरे परिवार या गांव का वोट डाल सकता है, और सत्तारूढ़ गठबंधन वाली भाजपा या चुनाव आयोग को कोई आपत्ति नहीं होती, हिमाचल प्रदेश में चुनाव की तारीखें घोषित करने के बाद गुजरात में चुनाव तय करने के आयोग के फैसले पर उठे सवालों पर वह कोई सटीक जवाब नहीं दे पाता, वहीं दूसरी ओर सत्तारूढ़ बड़े नेताओं के चुनावी दौरों में हेट स्पीच पर तमाम सबूतों के बावजूद वह कोई पाबंदी या रोकथाम नहीं लगा पाता। ऐसे में यह मानना कि महज सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से देश की राजनीतिक सत्ता तक पहुंच बनाने वाली व्यवस्था को बदल दिया जाएगा, खुशफहमी से ज्यादा कुछ और नहीं हो सकता। यह जरूर है कि सुप्रीम कोर्ट ने देश में संविधान के मूल्यों की रक्षा के लिए इसी संविधान के तहत उसे दिए गए अधिकारों और कर्तव्यों का पालन करते हुए अपना दायित्व निभाया है। अब देश यह जानना चाहता है कि न्यायपालिका की इस पहल पर कार्यपालिका, विधायिका और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ मीडिया का क्या रुख रहता है।