Friday, September 30, 2011

शिक्षा की व्‍यवस्‍था से अनबन भला क्‍यों

शिक्षा की व्‍यवस्‍था से अनबन भला क्‍यों

अमन नम्र
शिक्षा और व्यवस्था के फेर में मैं इन दिनों बुरी तरह उलझा हुआ हूं। समझ नहीं आता शिक्षा की मेरी सोच गलत है या शिक्षा व्यवस्था की उनकी यानी स्‍कूलों की सोच। मेरे हिसाब से शिक्षा और व्यवस्था दो भिन्न चीजे हैं, शिक्षा यानी हर दिन, हर पल, हर गुजरते क्षण से कुछ नया सीखना और व्यवस्था यानी एक बनी-बनाई लीक, ढर्रे पर चलना। शिक्षित होना यानी खुद को पहचानना, आस-पास को जानना, समाज के हित में सोचना, भला करने की सामथर्य जुटाना और बुरे का विरोध करने की हिम्मत करना। वहीं व्यवस्था यानी बने-बनाए ढर्रे को चलाए रखने के लिए पढ़े-लिखे मशीनी पुर्जे तैयार करना, क्लर्क, अधिकारी,, बैंकर, इंजीनियर की लाइन खड़ी करना।
मैंने खुद तो बचपन में ही शिक्षा व्यवस्था स्वीकार कर ली थी, जस की तस। यानी, किताबों का रट्टा मारो और पास हो जाओ। स्‍कूल भी खुश, घर भी खुश। लेकिन अब ऐसा नहीं है, नई पीढ़ी इस व्यवस्था को मानने को राजी नहीं है। मेरे बेटे को ही लें, स्‍कूल से आए दिन उलाहनाएं, शिकायतें। कई बार तो स्‍कूल प्रबंधन ने बाकायदा बुलाकर वार्निंग तक दे दी। शिकायत यह कि वह वैसा नहीं करता जैसा बाकी बच्चे चुपचाप करते हैं। यानी,, जैसा कहा जाए ठीक वैसा। जब मैंने बेटे से पूछा तो उसका सवाल मुझे निरुत्तर कर गया। उसने पूछा, जो मुझे आता है, वह बार-बार क्यों पढ़ूं, आप पढ़ते हो क्या?
मजे की बात यह कि जब भी स्‍कूल में कोई नई गतिविधि, नया पाठ होता है, उसकी शिकायतें हवा हो जाती हैं। लेकिन दो या तीन दिनों तक ही। जब वही जानकारियां दो, तीन, चार और फिर बार-बार रटाई जाने लगती हैं, अक्सर उसकी मर्जी के खिलाफ तो वह बगावत पर उतर आता है। कक्ष में उत्पात शुरू कर देता है। दूसरे बच्चे जो चुपचाप 'शिक्षा की व्यवस्था चला रहे होते हैं उसके निशाने पर होते हैं। वह उनकी कापियां फाड़ देता है, किताबें फेंक देता हैं। विरोध जताने के और भी तमाम तरीकों पर पर अमल कर गुजरता है। अब तो स्‍कूल से आखिरी चेतावनी मिल चुकी है कि बच्चे को 'सुधार लें या किसी और स्‍कूल की राह लें। मेरी चिंता यह है कि बच्चे को 'सुधार कर उसे रटंत विद्या वाली शिक्षा व्यवस्था का पुर्जा बनने के लिए झोंक दूं या शिक्षा हासिल करने के लिए मुक्त रहने दूं?
उसे सितारों की सैर की कहानी सुनना बेहद पसंद हैं। समुद्र की गहराईयों में क्या-क्या मिलता है ये जानने में वह कभी बोर नहीं होता। पृथ्वी कब बनी,, आदमी कैसे इस पर आया, ज्वालामुखी जमीन के अंदर से बाहर कैसे निकलता है, ग्रहण कैसे लगते हैं, ये उसकी जिज्ञासाओं के विषय हैं। ऐसे में जब स्‍कूल प्रबंधन कहे कि वह ए फॉर एप्पल और बी फॉर बैलून बार-बार नहीं लिखता तो चाह कर भी मैं दोष बेटे में नहीं निकाल पाता। शायद ऐसी ही है शिक्षा की यह व्यवस्था। क्या कभी यह व्यवस्था ऐसी होगी जो बच्चों की जरूरत और रुचि के मुताबिक बने। जो बच्चों को सामाजिक सरोकारों, नैतिक मूल्यों और देश की जरूरतों से जोड़ें, उन्हें डाक्टर, इंजीनियर, अफसर से पहले अच्छा इंसान बनाए। उनका बचपन भी बना रहे और उनमें देश के जिम्मेदार नागरिक की नींव भी पड़ जाए। जब लॉर्ड मैकाले ने हमारे देश की शिक्षा व्यवस्था बदली थी तब उनका मानना था कि अंग्रेजी नहीं जानने वाले, अनपढ़ भारतीय अंग्रेजी साम्राज्य के लिए खतरा बन सकते हैं। वहीं अंग्रेजी जानने वाले भारतीयों से उन्हें कोई खतरा नहीं होगा; क्या आज भी शिक्षा व्यवस्था के पैरोकार कुछ ऐसा ही नहीं सोचते कि उनकी व्यवस्था में शिक्षा नहीं हासिल करने वाले उनकी व्यवस्था के लिए खतरा बन सकते हैं। बहरहाल, मैं तो इन दिनों अपने बेटे के लिए एक अदद ऐसे स्‍कूल की खोज में हूं जहां व्यवस्था भले न हो पर वह 'शिक्षा देता हो।

Saturday, August 27, 2011

सत्‍ता की पाती जनता के नाम


तुम जनता हो
अपनी हदें पहचानना सीखो
तुम्‍हारी नियति है राशन-पानी के लिए
कतारों में लगना
राशन-पानी लेकर कतारों में उतरना
कैसे सीख लिया
सडृकों के किनारे झुग्गियों में रहना ही रास आता है तुम्‍हें
तुम कबसे सडृकों पर उतरने की जुर्रत करने लगीं.
तुम्‍हारे भाग्‍य में बदा है कि तुम भ्रष्‍टाचार सहो
भ्रष्‍टाचार का विरोध करना तुमने कहां से सीखा
तुम्‍हारी जुबां पर नारे वो होने चाहिएं जो हमने तुम्‍हें सिखाए
विरोधी पार्टियों की बजाय तुम इंकलाब जिंदाबाद कैसे बुलंद करने लगीं
तुम्‍हें घर, फ्लैट और उसमें टीवी चैनल दिए
ताकि हर शाम देख सको, सास-बहू का झगड्रा
नई फिल्‍में और कॉमेडी सीरियल
सडकों पर कैंडल और मशाल लेकर उतरने की तुम्‍हारी हिम्‍मत कैसे हो गई

तुम्‍हें तो हमने पांच साल में बस एक बार चेहरा दिखाने का आदी बना लिया था
यूं, अचानक सडकों पर हमारे खिलाफ बोलने को तैयार कैसे हो गईं तुम
हम फिर कहते हैं
तुम जनता हो
अपना अस्तित्‍व पहचानो
तुम्‍हारी पहचान वोटर की है
तुम्‍हारा अधिकार है कि तुम वोट दो हमें
और इसी वोट के साथ सारे अधिकार भी हमें ही दे देती हो तुम

तुम्‍हारा समूचा वजूद इसी में है कि ता उम्र तुम खटती रहो
हमने पूरी व्‍यवस्‍था की है कि तुम्‍हें
रोजमर्रा के कामों में ऐसे उलझाएं कि
तुम आंदोलन, क्रांति की फिजूल बातों से दूर रहो
तुम्‍हें अपने बच्‍चों, परिवार की चिंता नहीं होती
तुम तो बनी ही इसलिए हो कि हर सुबह तुम्‍हें
दिन कैसे गुजरे की चिंता हो
और हर रात, आज का दिन गुजर गया, का सुकून
.

तुम्‍हें भविष्‍य की चिंता करना किसने सिखाया
आत्‍मसम्‍मान, गरिमा, ईमानदारी, देशभक्ति, जज्‍बा, जोश
बेमानी हैं ये सारे शब्‍द
याद करो, तुम्‍हारी जिंदगी किन शब्‍दों के सहारे चलती है
वेतन, महंगाई,रिश्‍वत, भ्रष्‍टाचार, मजबूरी, नौकरी, लाचारी और अफसोस
तुम्‍हें खुद को पहचानना ही होगा
अपने अस्तित्‍व को जानना ही होगा

तुम तभी तक जनता हो जब तक सोई हुई हो
हमारी भ्रष्‍ट व्‍यवस्‍था में अपना वजूद खोई हुई हो
अगर तुम जाग गई तो हमें खतरा हो जाएगा
तुम्‍हारा हदें पार करना हमारा अस्तित्‍व लील जाएगा
इसलिए, मत करो तुम व्‍यवस्‍था परिवर्तन की यह कोशिश
भूल जाओ, इंकलाब जिंदाबाद, वंदे मातरम के नारे
तुम जनता हो,
अपनी हद में रहो
तुम सहनशील बनो, संवेदनशील नहीं
संवेदनाएं हमारे लिए छोड दो
हादसो, धमाकों में मारे गए लोगों के परिजनों के लिए
हमारे भाषणों में इन्‍हीं का तो इस्‍तेमाल होता है.
तुम असहाय, निष्‍पंद, निष्‍प्रभ रहो, जागरूक बनना तुम्‍हारी नियति नहीं है

तुम्‍हें सपने वहीं देखने हैं जो हम दिखाते हैं, इंक्रेडिबल इंडिया के
तुम कबसे बुलंद भारत के तस्‍वीर संजोने लगी
तुम्‍हें तो खेतों में खटना है, फैक्ट्रियों में पिसना है
आफिसों में, फाइलों के बोझ तले गुजार देनी है तमाम उम्र

हमने इसीलिए तो बदल दी है सारी शिक्षा व्‍यवस्‍था
ताकि बना सकें, क्‍लर्क, इंजीनियर, चपरासी और अफसर
जो बन सकें हमारी व्‍यवस्‍था के कल-पुर्जे
तुम इस व्‍यवस्‍था को ढहाना चाहती हो,
हमारी सारे किए-धरे को मिट्टी में मिलानी चाहती हो
व्‍यवस्‍था विरोधी बन देशद्रोही का कलंक अपने माथे लगाना चाहती हो

नहीं यह सही नहीं है
हमारी नीयत भले ही ठीक न हो, नियति तो सही है
तुम क्‍यों नीयत का सवाल खडा कर अपनी नियति बिगाडती हो.
जनता हो, भीड में रहो, आंदोलनकारी बन क्‍यों हमें डराती हो, ,,,,,

Wednesday, August 10, 2011

An story published in hindu business line

A river is reborn





Aman Namra



River Aravari came to life in 1994. Till then, it was a largely dead and dry watercourse that flowed only during the monsoons. Now johads (small water harvesting structures) are full to the brim and fresh green foliage peeps out of the arid and denuded s lopes of the Aravalli hills.

In 1987, a non-governmental organisation, Tarun Bharat Sangh (TBS), took the initiative to rejuvenate the streams of River Aravari by constructing a johad at Bhavta village. As the many advantages of johads came to the fore, other villages followed suit.


In 1988, johads came up in Bhurivas, Dumli, Khadata, Khatala, Samastar, Chosla and Lalpur villages. Between 1989 and 1991, the idea spread to Palsana, Loge ki Dhani, Bhaonta, Kolyala, Hamipur, Samara, Natata, Kaled and Jagnathpura villages which fall und er the Thanaghazi block of Alwar district in Rajasthan.

The water in the johads helped raise the water-table of the river's catchment area and also enriched the surrounding forests. The forests and scrubs, in turn, helped retard the run-offs from monsoon rains. Within a decade, the Aravari came to life and it now flows throughout the year.

Says Rajendra Singh, General Secretary of TBS, ``The conservation miracle was possible through the concerted efforts of villagers who were assisted by our organisation. Our movement is really 13 years old, though the river came back to life in 1994. The villagers have shown extreme patience and tenacity while attempting to improve their own livelihood and living conditions. When we started our work we adopted a strategy which was entirely different from Government-sponsored programmes. We make the villa gers stake-holders in whatever activity we undertake and that itself ensures its survival and long-term sustainability.''

Thus a perennial river was reborn despite an unforgiving climate. Rajendra Singh admits that the success was much bigger than anticipated. ``All we wanted to do was revive the traditional johads as there was tremendous demand for water in this dry region , as well as protect the trees, forest and wildlife of the region,'' he says.

The water conservation miracle in the Aravalli range has earned several accolades for Rajendra Singh including the National Award instituted by Rotary International, Sanskriti Puraskar, Nisarga Premi Puraskar and the Basu Bhatia Environmental award. He w as also selected Man of the Year for 1998 by The Week magazine.

When Rajendra Singh and his TBS activists first arrived in Bheekampura, the land was bleak and desolate. Even during winter the few peepul and babul trees lining the dusty road appeared withered. The Aravalli ranges were bare expect for a few forest patc hes at the foothills where the rainwater collected and, soon after, trickled away.

The hills were scarred due to marble quarrying. The greenery had all but vanished and, during rains, rock and sand slid down the hillsides leaving gaps on their face.

TBS first focused on Gopalpura village which, like most parts of Rajasthan in 1985-86, was in the grip of a severe drought. The wells were dry, the top-soil had eroded and water had to be fetched from 1.5 km away. Agriculture was uneconomical and the men migrated to Ahmedabad and Delhi in search of work.

The village check dams were in a state of disrepair. TBS had the support of the area's Block Development Officer (BDO) and the Junior Engineer (JE) who assured all technical help even as they pleaded helplessness in securing Government funds. TBS persuad ed the villagers of Gopalpura to offer shramdaan (voluntary labour) and collected grains to feed the volunteers.

As a test case, one johad was taken up for desilting and excavation in 1985 and the results were apparent within two years -- following the 1986 monsoon, the water level in the johad was higher than before and remained intact for a longer period.

The villagers were wonderstruck by the miracle wrought by their own hands. ``It qualitatively changed the life of the villagers,'' 70-year-old Dhanna of Bhaonta village says, ``our women had to walk over 3-5 km just to fetch water but now there is water in the river and in the wells. Children splash about in the river, women wash clothes, men have leisurely baths and even animals have a ghat to bathe and drink.''

``Things have improved to such an extent that people who had earlier migrated to the slums of Delhi and Ahmedabad are returning to their villages,'' Arjun Gujjar says. ``Even the river has come alive with fish that are 2 ft in length and weigh up to 10 k g.''

The fish are, however, protected and fines imposed on those caught fishing. A Jaipur-based businessman who was awarded a contract to fish in the river by the Government's Fisheries Department was driven away by the villagers.

The task of restoring a dam which is 1,400 ft long, 20 ft high and 50 ft wide was tough for a small village with 350 people. By putting in 10,000 mandays and sharing the cost of repairs to the sluices and overflow systems, the tank has been restored to i rrigate up to 600 bighas (200 hectares) of agricultural land. Inspired by Gopalpura, Govindpura soon followed suit.

Today, more than 3,000 johads have been restored or built in 350 villages which has benefited about 700 other villages.

TBS's work in the region also extends to the preservation of the Sariska Tiger sanctuary, producing organic manure, promoting indigenous methods of farming, village education, public and traditional healthcare systems, bio-mass projects, afforestation, s elf-employment in spinning and weaving industry, eradication of child labour and grain stocking, running creches, training panchayat representatives and launching movements for the closure of illegal mines.



Pic.:River Aravari -- from death to rebirth.

Wednesday, July 20, 2011

जब फिल्‍म देखने के लिए लिखित मंजूरी लेता था


मेरा बेटा अभी पहली कक्षा में है और टीवी या कंप्‍यूटर पर जब चाहे अपने पसंदीदा कार्टून चैनल देख सकता है. सात महीने की बिटिया को खाना खिलाने के लिए कभी-कभी मैं कंप्‍यूटर पर बच्‍चों के वीडियो उसे दिखाकर बहलाता रहता हूं. ये है आज की पीढ्री. अब जरा मैं अपने बचपन की भी बताता चलूं. मैंने पहली फिल्‍म देखी थी जब नौवीं में पढ्रता था, वो भी पापा की मंजूरी से. पापा का घर में एक अलग ही अनुशासन चलता था. एक महीने में एक फिल्‍म. कई बार ऐसा होता था कि अनूपपुर के फट्रटा टाकीज, उसका नाम यूं तो जनता टूरिंग टाकीज था लेकिन बोरे और टाट से घिरा होने के कारण हम उसे फट्रटा टाकीज ही कहते थे, तो मैं यह बता रहा था कि इस टाकीज में कभी-कभी बच्‍चों की फिल्‍म लग जाती थी. ऐसे में हमें एक माह की अवधि के बीच में भी फिल्‍म देखने की मंजूरी मिलती थी, बशर्ते इसकी बाकायदा लिखित अनुमति मांगी जाए. मुझे याद है जब शोले लगी थी, तब मैंने एक पन्‍ने में कुछ यूं फिल्‍म देखने की गुजारिश की थी.
आदरणीय पापा,
मैंने इस महीने फिल्‍म देखने का अपना कोटा पूरा कर लिया है. लेकिन इस पञ को लिखने का एक खास कारण है. अनूपपुर में इन दिनों शोले फिल्‍म लगी हुई है. जैसा कि आप जानते हैं, यह बहुत ही अच्‍छी फिल्‍म है, अगर मैं एक महीने का इंतजार करूंगा तो शायद इसे ना देख पाउं. इसलिए आपसे अनुरोध है कि मुझे इस फिल्‍म को देखने की खास मंजूरी दें इसके बदले में मैं अगले महीने एक भी फिल्‍म नहीं देखने का वादा करता हूं.
आपका
अमन

और मेरी खुशी का ठिकाना ना रहा जब मुझे फिल्‍म देखने की मंजूरी मिल गई. बाद में जैसे-जैसे कक्षाएं और उम्र बढ्रती गई नए-नए तरीके विकसित होते गए. मसलन, अनूपपुर में एक और टाकीज खुल गया, इससे यह आसानी हुई कि मैं मंजूरी लेता था एक फिल्‍म की और क्‍लास से बंक मार कर देखता था दो फिल्‍म, यानी 3 से 6 वाला शो एक टाकीज में और 6 से 9 वाला, मतलब आधिकारिक शो दूसरे टाकीज में, जिसका टिकट भी संभाल कर रखना पड्रता था, घर में दिखाने के लिए. एक्‍स्‍ट्रा फिल्‍म देखने के लिए अपनी पाकेटमनी की जरूर कुर्बानी देनी होती थी. तब मुझे रोज के पचास पैसे मिलते थे पाकेटमनी के बतौर, इसमें से 25 पैसे का बन यानी गोल डबलरोटी खाता था और बाकी पैसे फिल्‍म के लिए बचाकर रखता था, अक्‍सर ये भी होता कि बेताब जैसी फिल्‍म देखने के लिए बिना मंजूरी लिए 3 से 6 का शो देख लेता था, जो उस वक्‍त 75 पैसे में देखा जा सकता था, बालकनी थी एक रुपए 75 पैसे की. ऐसे में घर में बचने का बहाना होता था कि आज क्रिकेट मैच थोड्रा लंबा खिंच गया. बाद में वहां वीडियो पार्लर खुले जिसमें एक छोटे से कमरे में नई फिल्‍में लगनी शुरू हुईं और क्‍लास से बंक भी कुछ ज्‍यादा ही मारने लगा. ये अलग बात है कि बचपन की पिटाई से तब तक पढ्राई करने की आदत पड्र चुकी थी सो फेल होने की नौबत नहीं आई. 11वीं में तो पूरे स्‍कूल में सबसे ज्‍यादा नंबर लाने पर पुरस्‍कार भी मिला और सर्टीफिकेट भी. वो तभी संभाल कर रख लिया था, क्‍योंकि पता था जिंदगी में ऐसा दूसरी बार तो होना नहीं है.
आज भले ही टीवी, कंप्‍यूटर पर चाहे जितनी फिल्‍म, वीडियो देख लूं लेकिन वो मजा जो मंजूरी लिए बिना चोरी-चोरी फिल्‍म देखने में आता था अब कहां नसीब होगा.

Tuesday, October 12, 2010

चार माह का भ्रूण मुस्‍कुराया, 42 फीसदी बच्‍चे कुपोषित

कल दो खबरें अलग अलग पेजों पर पढने को मिलीं, एक में विदेशी वैज्ञानिकों के एक परीक्षण की जानकारी थी जिसके मुताबिक चार महीने का भ्रूण भी संवेदनाओं का महसूस कर सकता है. वह अपनी मां की भावनाओं को पहचानकर गमजदा या खुश हो सकता है. इस बारे में एक भ्रूण की मुस्‍कुराती हुई तस्‍वीर भी प्रकाशित की गई. कुछ अखबारों में यह खबर पेज 1 पर भी तो कुछ में अंदर. इसी के साथ एक दूसरी यह खबर थी कि भारत के बच्‍वे विश्‍व में सर्वाधिक कुपोषित हैं. ग्‍लोबल हंगर इंडेक्‍स के मुताबिक भारत के 42 फीसदी बच्‍चे कुपोषित हैं.
अब ऐसे समय में जब कॉमनवेल्‍थ गेम्‍स में खिलाडी सोना जीत रहे हों, सचिन तेंडुलकर 49वां शतक लगा रहे हों, हॉकी में भारत अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्‍तान को हराकर सेमीफाइनल में पहुंच गया हो, देश के 42 फीसदी बच्‍चों के कुपोषण की खबर छप जाए यही बहुत है.
हम खेल की अपनी चुनिंदा जीतों पर इतने खुश हैं कि गर्त में जा रहे भविष्‍य के बारे में सोचना भी नहीं चाहते. अगले पांच सालों में हम विश्‍व की तीसरी सबसे बडी ताकत बनेंगे, चीन को पीछे छोड जाएंगे और साथ्‍ा में होंगे 42 फीसदी भूखे नंगे पेट वाले नाक सिकोडुते बच्‍चे. ये न तो मीडिया में सुर्खियां बन पाएंगे ना ही इनके नाम पर वोट खरीदे या बेचे जाएंगे. क्‍योंकि इन्‍हीं की कीमत पर हम स्‍वर्णपथ पर दौडेंगे सरपट. मुकेश अंबानी बनेंगे देश के सबसे अमीर आदमी, देश के एक लाख से बढकर शायद पांच लाख लोग हो जाएंगे अरबपति, ऐसे में कुछेक करोड बच्‍चे महज कुछ रुपयों, सरकारी योजनाओं में घपलों, अधिकारियों की लापरवाही की वजह से कुपोषित रहे जाएं, उनमें कुछेक लाख असमय ही काल की भेंट चढ जाएं तो क्‍या फर्क पडता है. आखिर ये हमारे टीजी (टारगेट ग्रुप) थोडे ही ना हैं. ये कंबख्‍त ना तो अखबार पढते हैं ना ही उसमें विज्ञापन देते हैं फिर इनकी खबर आखिरकार क्‍यों छपे. आज तो सीधा सीधा लेन देन का मामला है. खबर उसकी जो अखबार पढुकर रीडरशिप बढाए और विज्ञापन कमवाए.
अफसोस केवल इसी बात का है कि हम पत्र् कार आखिर कब तक यूं ही अपनी संवेदनाओं को मारते रहेंगे, हमारा जी भी तो कभी कचोटता होगा कि मंदिर मस्जिद, राजनीतिक बयानबाजी, अमीरों के चोंचलों की खबरें अनुवाद और सुधार सुधार कर हम कब भाडगीरी करते रहेंगे.
खैर जब जिसका जमीर जागे, तभी सही. नहीं तो लोग तो हैं ही. जब बात पेट पर आए तो हर रिश्‍ते हर आंकडे और विकास का हर नारा बेमानी हो जाता है, जिसदिन ये 42 फीसदी कुपोषित बच्‍चे, अगर इनमें से आधे भी बचकर बडे हो गए, और हमारे विकास की चकाचौंध से अपना हिस्‍सा मांग बैठे तो हमारी सारी मानसिक और आर्थिक दलाली की ताकत धरी की धरी रह जाएगी, क्‍योंकि इनके पास खोने के लिए कुछ नहीं होगा और तब हमारे पास बचाने के लिए कुछ नहीं होगा.
इस पाप में जो सीधे सीधे भागी हैं वे तो हैं ही, हम ऐसी कौम हैं जिसपर इस पाप के दस्‍तावेजीकरण की तथाकथित जिम्‍मेदारी है, अगर हम भी इसी पाप में शामिल हैं तो असल पापी से ज्‍यादा बडे गुनहगार होंगे.

Sunday, September 5, 2010

मेरे गुरु जी

अभी कल ही शिक्षक दिवस था, कहीं शिक्षकों का सम्‍मान किया जा रहा था तो कहीं अपनी मांगों पर प्रदर्शन कर रहे शिक्षकों की पिटाई. ऐसे में अचानक मुझे भी अपने गुरु जी याद आ गए. मैंने आठवीं तक की पढ़ाई ठेठ देहाती माहौल में बेंत वाले गुरुजी की संगत में की है, यह अलग बात है आठवीं तक कभी पिटाई नहीं हुई. एक बार पांचवीं कक्षा में जब में जमुड़ी की प्राइमरी शाला मं पढ़ता था, तबका एक वाकया याद आ रहा है. तक स्‍कूल में बैठने के लिए मैं घर से एक बोरा अपने स्‍कूल बैग् के साथ लेकर जाता था, सरकारी से जो टाट फट्टी मिलती थी, वह अक्‍सर मास्‍साब के घर में पाई जाती थी, इसलिए नीचे गोबर लिपी फर्श पर बैठने से बेहतर यही लगता था कि अपनी बिछावन साथ लाया जाए. एक बार हुआ यह कि मैं बोरा बिछाकर स्‍कूल बिल्डिंग के बगल में सूसू करने गया, लौटकर आया तो देखा कि एक लड़का मेरे बोरे पर कब्‍जा जमाए बैठा है. एक दो बार उसे उठने को कहा, नहीं समझा तो बोरा जोर से खींचा और उसी से 10 से 15 बार उसे खींच खींचकर मारा. तब पहली बार घर में शिकायत आई. लेकिन पिटाई तो खैर फिर भी नहीं हुई.
हुई तब, जब कंबख्‍त सरस्‍वती शिशु मंदिर के कुर्ता धोतीधारी गुरुजी की संगत मिली. पापा ने अनूपपुर के सरस्‍वती शिशु मंदिर में शायद यह सोचकर नाम लिख्‍ावा दिया कि यहां बेटा ठीक से पढ़ाई करेगा. वहां गुरुजी जुबान से कम बेंत और पेंसिल को हाथों की अंगुलियों में दबाकर ज्‍यादा पढ़ाते थे. एक बार सात या आठ का पहाडा नहीं सुनाने पर सामने खड़े लड़के की पेशाब करने की हद तक पिटाई की गई. बस तभी ठान लिया कि इस निर्मम स्‍कूल में तो पढ़ना ही नहीं. अब यह बात पापा से कौन से कहे, वे तो मानने से रहे. तब मैं और बड़ा भाई उसी स्‍कूल में साथ में पढते थे, मैंने तो बस तय कर लिया था कि स्‍कूल नहीं जाना है तो नहीं जाना है. सवाल यह था कि स्‍कूल से पीछा कैसे छुड़ाया जाए, इसके लिए उस उम्र में यही तरीका सूझा कि घर में बिना बताए स्‍कूल से बंक मारा जाए. तो किया यह कि रोज सुबह घर से टिफिन में परांठे, सब्‍जी लेकर स्‍कूल के लिए निकलता और अनूपपुर से थोड़ा पहले चंदास नदी में पूरी दोपहर मछली पकड़ने में निकाल देता. हर शनिवार जब नया इंद्रजाल कामिक्‍स खरीदता तब बड़ा मजा आता, नदी किनारे बालू में बैठकर कामिक्‍स पढ़ता, फिर अपना नाश्‍ता करता, और फिर नदी में छपछप शुरु.
आखिर कब तक चलता यह, एक दिन स्‍कूल की छुट़टी होने के बाद के अपने निर्धारित समय पर घर पहुंचा तो बाहर आंगन में नजर पड़ते ही दिल धक्‍क से रह गया. स्‍कूल के गुरु जी पापा के पास कुर्सी पर बैठकर कुछ बात कर रहे थे. जैसे ही पहुंचा, पापा ने पूछा कहां से आ रहे हो, जवाब में कुछ नहीं बोला, कुछ बोलने को था ही नहीं. अभी मन ही मन गुरुजी के लिए गालियां निकाल ही रहा था कि दूसरा सवाल दग गया आज स्‍कूल गए थे, जवाब में सर नहीं में हिला दिया, लेकिन उन्‍होंने कड़ककर कहा, जबान नहीं है क्‍या मुह से बोलो, तो मंह से बोल फूटे, नहीं. उन्‍होंने फिर पूछा, कल स्‍कूल गए थे, फिर नहीं, परसों गए थे, नहीं. बस . . . . फिर क्‍या था, उन्‍होंने कहा जाओ एक बांस की छड़ी लेकर आओ, अब तो हाथों से पसीने छूट गए. मुझसे ही मेरी बरबादी का सामान मंगाया जा रहा था. लेकिन मरता क्‍या न करता, जाना ही पड़ा. वहां तो बांसों का पूरा झुरमुट था, अब मेरी हालत बड़ी अजीब से हो गई थी, छांटने में लगा था कि कौन सा बांस लूं, पतला या मोटा. मोटा लेने का यह डर था कि अगर एकाध पीठ पर जोर से पड़ गई तो हो गया काम. बहुत पतला बांस जहां पड़ता वहीं चमड्री उधेड़ देता. लेकिन लाना तो था ही, ज्‍यादा से ज्‍यादा 10 मिनट ही बांस से अपने मनमुनासिब छडी ढूंढने का समय निकाल सका, इस बीच दो बार उनकी आवाज आ गई, छड़ी नहीं मिल रही तो बताओ, मैं ही ले आता हूं. तब रुआंसा होकर बोला, ला रहा हूं. और एक बीच की मोटाई वाली करीब मीटर भर लंबी छड़ी लेकर उनके पास पहुंच गया. जैसे ही पहुंचा गुरुजी यह कहकर उठे और वापस गए कि परसों से परीक्षा है, ठीक से तैयारी कर भिजवा दीजिएगा.
बस, उधर गुरुजी गए इधर पापा शुरू हो गए. पूछा कहां जाते थे,
बताया कि नदी में मछली पकड़ता था,
उन्‍होंने कहा, हाथ आगे करो,
सड़ाक,
फिर पूछा, कितने दिनों से,
एक महीने से,
सड़ाक,
किसी को बताया,
नहीं
सड़ाक,
फिर पूछा, स्‍कूल क्‍यों नहीं जाते थे,
गुरुजी बहुत मारते हैं
......
इस बार सड़ाक की आवाज नहीं आई तो बंद आंखें खोलकर देखा, हाथों में छड़ी उठी जरूर थी पर पडी नहीं.
क्‍यों मारते हैं, पूछने पर बताया जबरदस्‍ती पहाड़ा याद कराते हैं, थोड़ा भी भूलो तो बहुत मारते हैं, अब वहां पढ़ने नहीं जाउंगा.
बस उस दिन के बाद सरस्‍वती शिशु मंदिर से पीछा छूटा. उन्‍होंने जमुड़ी से तीन किलोमीटर दूर सकरा नामक एक दूसरे गांव में दाखिला करा दिया. वहां तो मैं राजा था, अपनी क्‍लॉस का मॉनिटर. बस हर दिन स्‍कूल आने जाने के लिए 6 किलोमीटर चलना अखर जाता था, कुछ दिनों बाद एक शार्टकट पता चला और दो किलोमीटर का रास्‍ता कम हो गया. बस हर दिन पैदल आना और जाना, रास्‍तें में कभी तेंदू खाना कभी जामुन तो कभी चिरौंजी या भेलमा. भेलमा आपमें से ज्‍यादातर लोग नहीं जानते होंगे, यह देखने में जंगली काजू जैसा होता है, पकने पर खाने में बेहद स्‍वादिष्‍ट पर कच्‍चा खाओ तो होंठों पर सूजन आ जाती है.
बहरहाल, सकरा के ही स्‍कूल में मिले थे हमारे हेडमास्‍साब मारको सर, उनका पहल नाम याद नहीं आ रहा, शायद अजय था. चेहरे पर दाढ़ी, चौड़ा बेलबॉटम, चमकदार शर्ट यानी फिल्‍मी हीरो जैसे थे हमारे हेडमास्‍साब. मारको उनका सरनेम थे, वे गोंड आदिवासी थे, बाद में समझ में आया कि अपने समुदाय से पढ़ लिखकर अलग दिख्‍ाने की ललक ने उनके तेवर अलग कर रखे थे, उनकी पहली मैडम यानी पत्‍नी आदिवासी थीं, देहाती सरीखी,लेकिन हमारे 6वीं से 7वीं में जाते जाते मारको हेडमास्‍साब ने एक ठाकुर लड़की को अपनी पत्‍नी बना लिया. तब वह बमुश्किल 16 या 17 साल की रही होगी. खैर हमें तब इन बातों से ज्‍यादा मतलब नहीं था, वे मेरे फेवरेट थे, क्‍योंकि कभी पिटाई नहीं करते थे, हां बदले में घर से उनके लिए कभी खीरा, कभी भुट़टा ले जाया करता था. एक बार तो आधी छुट़टी के बाद उन्‍होंने हम सभी बच्‍चों को छुटृटी दे दी और कहा, जाओ सामने की पहाड़ी पर घूमकर दो घंटे के अंदर जितनी सूखी लकड़ी मिले समेट लाओ, हम कुल करीब 30 से ज्‍यादा ही थे, उनके लिए एक महीने खाना पकाने की लकड़ी की जुगाड़ हो गया. मुझे तो पहाड़ी पर घूमने में बडा मजा आया. हां तब में आठवीं में था, मारको हेडमास्‍साब लगभग हर साल अलग से हमें इंपोटेंट सवालों की लिस्‍ट पकड़ा देते और क्‍लास में फर्स्‍ट आने का मौका देते. तभी ऐसा हो पाया कि 6वीं से आठवीं तक मैं हर साल कक्षा में प्रथम आता रहा. यह अलग बात थी कि 8वीं में जनवरी तक स्‍कूल में गणित की किताब खुली तक नहीं थी, लेकिन घर में पापा ने पढ़ा दिया सो पास हो गया. हां एक बात अच्‍छी हुई थी 8वीं में पढते समय मैंने अपना पहला और अब तक का पहला ही उपन्‍यास लिखा, खून का रिश्‍ता, पूरा उपन्‍यास हाथ से लिखा, गरमियों में महुए के नीचे बैठकर आराम कुर्सी पर लेटकर. इसके बारे में फिर कभी बताउंगा, अभी इतना ही....

Thursday, August 5, 2010

धोखे की पत्र्कारिता


मीडिया में रहकर संवेदनाओं का कचरा हो गया है, हर दिन ही यह हाल है कि शाम 7 बजते बजते लीड खबर न मिले तो सिर चकरघिन्‍नी से घूमने लगता है, हद तो तब हो जाती है जब किसी बडी दुर्घटना या हादसे की खबर बनते बनते रह जाए, अब परसों की ही बात है, दो ऐसी खबरें थीं जिनकी पहली सूचना से लगा कि बस आज मिल गई लीड, लेकिन कंबख्‍त ऐसा हुआ नहीं. पहली खबर छत्‍तीसगढ़ के दंतेवाडा़ से थी जहां नक्‍सलियों और सुरक्षाबलों के बीच मुठभेड़ जारी थी, दिन की खबरों में सूचना थी कि 6 जवान शहीद हो गए और करीब 45 लापता हैं, इससे लगा कि आज लीड खबर का संकट नहीं होगा, यह तो बनीबनाई खबर सभी संस्‍करणों में लीड छपेगी. लेकिन सात बजते बजते पता चला कि एक भी जवान शहीद नहीं हुआ, उल्‍टे नक्‍सलियों को मुंह की खानी पडी़. कई संस्‍करणों से लगातार फोन आ रहे थे कि लीड खबर कब तक मिल रही है, उन्‍हें टका से जवाब देना पडा् कि एक भी शहादत नहीं हुई सो खबर किल हो गई है.
इस दौरान एक भी बार यह विचार मन में नहीं आया कि अगर मुठभेड्र में जवान शहीद नहीं हुए और उधर नक्‍सलियों की भी जान नहीं गई तो इस जानकारी से मन में कहीं किसी कोने में संतोष की लहर क्‍यों नहीं दौड़ी. आखिर क्‍यों हम ये मना रहे थे कि एक ही देश का एक भाई दूसरे भाई की जान ले और हम उसकी खबर का जश्‍न मनाएं. क्‍या करें, इन दिनों मीडिया की हालत कुछ इसी तरह की हो गई है. और हां, दूसरी खबर के बारे में तो बताना भूल ही गया. यह खबर तालिबान के एक हमले की थी,जिसमें उसने दावा किया कि जुलाई के अंतिम सप्‍ताह में उसने दुबई के खिलाफ एक जहाज पर आत्‍मघाती हमला किया, जहाज के क्रू सदस्‍यों में 15 भारतीय भी थे. एजेंसी पर जारी इस खबर की हेडिंग और इंट्रो पढ्रकर लगा कि जहाज डूब गया और सारे भारतीय मारे गए, सो बनी पहले पेज की खबर. तुरंत अपने साथी को बताया कि फर्स्‍ट नहीं तो सेकंड लीड तो मिली ही समझो. लेकिन जब पूरी खबर पढ़नी शुरू की तो पता चला कि आत्‍मघाती हमले में केवल हमलावर की मौत हुई है, वहीं हमले में महज एक व्‍यक्ति घायल हुआ जो अब ठीक है. यह खबर भी गई. तो... ऐसे हो गए हैं हम पत्र्ाकार लोग.
कुछ दिन पहले भोपाल के गांधी भवन में गांधीवादियों और सर्वोदयी कार्यकर्ताओं का एक राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन हुआ था, इसमें नक्‍सली समेत समाज की विभिन्‍न हिंसाओं से निपटने के लिए अहिंसक तरीकों पर विस्‍तृत चर्चा की गई थी. इसी सम्‍मेलन में गांधी शांति प्रतिष्‍ठान की अध्‍यक्ष राधा भट भी आई हुई थीं, उनसे मुलाकात हुई. हम चरखा संस्‍था की कुछ पुरानी कार्यशालाओं में मिल चुके थे सो वे सकारात्‍मक पत्र्कारिता के प्रति मेरे झुकाव और चरखा के दौरान की गई 50 से भी ज्‍यादा पत्र्कारिता कार्यशालाओं के बारे में जानती थीं. उन्‍होंने कहा, अमन, हम लोग कब तक ये हिंसा, मारकाट, लूटमार की खबरें पढ़ते रहेंगे, अब हमें समाज को कुछ पाजिटिव खबरें पढ़वानी चाहिएं, अच्‍छी खबरें देनी चाहिएं, तभी समाज की मानसिकता बदलेगी. इस पर मेरा जवाब था कि राधा जी, पाजिटिव खबरें पढ़ने वालों की संख्‍या बहुत कम है, इससे न्‍यूजलेटर तो छप सकता है अखबार नहीं. लेकिन यह जरूर संभव है कि अगर ठोस योजना के साथ काम किया जाए तो मुख्‍यधारा अखबारों में ही पाजिटिव खबरों की संख्‍या बढ़ाई जा सकती है, इसके लिए सभी को कोशिश करनी होगी, बहरहाल यह तो बहुत लंबी बहस का विषय है, लेकिन मुझे सौ फीसदी भरोसा है कि सकारात्‍मक पत्र्कारिता में ही भविष्‍य है और समाज को हिंसा के गर्त से उबारने का एक ठोस उपाय भी इसी में निहित है.
जरा इसपर विचार करें कि अखबार का समाज का आइना बताने वाले वे पत्र्कार या अखबारों के मालिक जो ग्‍लैमर, हिंसा, सेक्‍स की खबरों को इसलिए देने पर अड़े रहते हैं कि समाज में ऐसा हो रहा है इसलिए ये खबरें देना उनकी मजबूरी है, ऐसी नहीं करेंगे तो अखबार कौन पढ़ेगा, अगर वे अखबार के पितामह जेम्‍स आगस्‍टस हिक्‍की के हिक्‍की गजट पर नजर डालें तो समूचा परिदृश्‍य की बदल जाएगा. अगर अखबारों की आईना वाली अवधारणा हिक्‍की के समय में भी होती तो संभवतः अखबार का जन्‍म ही नहीं हुआ होता, हिक्‍की का गजट तो उस असंतोष, लाचारी और गुस्‍से की अभिव्‍यकित था जिसमें व्‍यक्ति को अपनी सही बात कहने का मौका नहीं दिया जा रहा था और किसी और विकल्‍प के अभाव में उसने एक पोस्‍टर सरीखे कागज को अपनी अभिव्‍यकित का माध्‍यम बनाया, तब यह सूचना का जरिया नहीं आक्रोश को जताने का माध्‍यम था, आज अखबारों से जनता का आक्रोश नजर नहीं आता, वह मालिक, संपादक और रिपोर्टरों के बीच मैनिपुलेट कर लिया जाता है. खबरें जो असल में होती हैं और जो छपती हें उनके बीच का अंतर समाज को धोखा देने से इतर और कुछ नहीं होता.

अखबार जो कभी समाज के विरोध की वजह से अस्तित्‍व में आया और इसी के चलते टिका रहा, अंग्रेजों को देश से खदेड़ने तक में अखबारों की भूमिका बेहद महत्‍वपूर्ण रही, आज राजनेताओं, मालिकों और संपादकों की तिकड़ी के इशारों पर कठपुतली की तरह नाच रहा है. उपेक्षितों की आवाज बनने वाला यह माध्‍यम आज शोषकों का मुखपत्र् बन चुका है. इस कुचक्र को तोड़ना इतना आसान नहीं है, जब लोग 15 रूपए का अखबार 3 रूपए में पढ़ते हैं उन्‍हें उसी वक्‍त यह समझ लेना चाहिए कि बाकी के 12 रुपए के लिए अखबार में कई सौदे किए हैं जो उनके सूचना पाने के अधिकार और असल खबर पढ़ने की इच्‍छा की कीमत पर किए गए हैं. आज इंटरनेट के युग में निश्चित तौर पर अखबारों का एकाधिकार टूट रहा है लेकिन भारत को ऑनलाइन होने में समय लगेगा, तब तक उन्‍हें यह अत्‍याचार झेलना ही होगा.
इससे उबरने या इससे निपटने संबंधी उपायों विचारों का स्‍वागत है.

Wednesday, July 21, 2010

पत्र्कारिता में आपातकाल

प्रेस विज्ञप्ति




विषय- अघोषित आपातकाल में पत्रकारों की भूमिका

संदर्भ- स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद पांडेय की कथित मुठभेड़ पर उठे सवाल



नई दिल्ली। 20 जुलाई। गांधी शांति प्रतिष्ठान में ‘जर्नलिस्ट फॉर पीपुल’ की ओर से ‘अघोषित आपातकाल में पत्रकारों की भूमिका’ विषय पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया।

इस विषय पर बोलते हुए आर्य समाज के नेता और समाजिक कार्यकर्ता स्वामी अग्निवेष ने कहा कि आज देश में आपातकाल जैसी स्थितियां हैं। स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय और भाकपा (माओवादी) के प्रवक्ता कॉमरेड आजाद की कथित मुठभेड़ पर सवाल उठाते हुए स्वामी अग्निवेष ने उनकी शहादत को सलाम पेश किया। और कहा कि इस इस दौर में पत्रकारों को साहस के साथ खबरें लिखने की कीमत चुकानी पड़ रही है।

‘इकोनॉमिक एंड पॉलिटिकल वीकली’ के सलाहकार संपादक और सामाजिक कार्यकर्ता गौतम नवलखा ने स्वतंत्र पत्रकार हेमचंद्र पांडेय और भाकपा माओवादी के प्रवक्ता आजाद की हत्या को शांति प्रयासों के लिए धक्का बताया। गौतम ने कहा कि आज राजसत्ता का दमन अपने चरम पर है। आजादी का ख्याल एक है। इसे अलग-अलग टुकड़ों में नहीं देखा जा सकता। देश के अलग-अलग हिस्से में सरकार अलग-अलग तरीके से पत्रकारों का दमन कर रही है। माओवादियों के संघर्ष, उत्तरपूर्व के संघर्ष और कश्मीर के संघर्ष को एक करके देखना होगा।


संगोष्ठी को संबोधित करते हुए ‘समकालीन तीसरी दुनिया’ के संपादक आनंद स्वरूप वर्मा ने कहा कि अब सरकारें अपने बताए हुए सच को ही प्रतिबंधित कर रही हैं। और जो भी पत्रकार इसे उजागर करने की कोशिश करता है उसे गोली मार दी जाती है। या देशद्रोही करार दे दिया जाता है। सही सूचनाएं पहुंचाने वाले संगीनों के साए में जी रहे हैं। उन्होने इस स्थिति के विरोध के लिए संगठन बनाने की जरूरत पर बल दिया।

इस मौके पर अंग्रेजी पत्रिका ‘हार्ड न्यूज’ के संपादक अमित सेन गुप्ता भी मौजूद थे। उन्होने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता कारपोरेट घरानों के इशारे पर संचालित हो रही है। खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की स्थिति और भी बुरी है। न्यूज चैनल के संपादक बॉलीवुड सितारों के गलबहियां करते नजर आते हैं। और अभिनेताओं से खबर पढ़वाई जाती है। नेता-कारपोरेट घरानों और मीडिया के गठजोड़ पर बोलते हुए अमित ने कहा कि देश के अलग अलग हिस्से में हुई घटनाओं को अलग अलग तरीके से पेश किया जाता है। खासकर एक संप्रदाय विशेष के लिए मुख्यधारा की मीडिया पूर्वाग्रह से ग्रस्त है। गुजरात दंगों और बाटला हाउस एनकाउंटर की रिपोर्टिग पर भी अमित सेन ने सवाल उठाए।

कवि और सामाजिक कार्यकर्ता नीलाभ ने कहा कि आज के दौर में पत्रकारिता के मूल्यों को बचाने के लिए बड़े पैमाने पर ‘सांस्कृतिक आंदोलन’ की जरूरत है। सरकारी दमन के मसले पर हिंदी के लेखकों की चुप्पी पर सवाल उठाते हुए उन्होने संस्कृति-कर्मियों, कलाकारों, चित्रकारों की एकता और आंदोलन की जरूरत पर बल दिया।

गोष्ठी को पत्रकार पूनम पांडेय ने भी संबोधित किया और कहा कि आपातकाल केवल बाहर ही नहीं है बल्कि समाचार पत्रों के दफ्तरों में भी पत्रकारों को एक किस्म के अघोषित आपातकाल का सामना करना पड़ता है।

इस मौके पर हिंदी के तीन अखबारों (नई दुनिया, राष्ट्रीय सहारा, दैनिक जागरण) के खिलाफ निंदा प्रस्ताव पास किया गया। इन अखबारों ने पत्रकार हेमचंद्र पांडेय की मुठभेड़ में हुई हत्या के बाद तत्काल नोटिस जारी करते हुए हेमचंद्र को पत्रकार मानने से ही इंकार कर दिया था।
गोष्ठी के आखिर में पत्रकार हेमचंद्र की याद में हर साल दो जुलाई को एक व्याख्यान माला शुरु करने की घोषणा की गई।


इस गोष्ठी को समायकि वार्ता से जुड़ी पत्रकार मेधा, उत्तराखंड पत्रकार परिषद के सुरेश नौटियाल, जर्नलिस्ट यूनियन फॉर सिविल सोसायटी के शाह आलम और ‘समयांतर’ के संपादक पंकज बिष्ट, पीयूसीएल के संयोजक चितरंजन सिंह ने भी संबोधित किया।


गोष्ठी का संचालन पत्रकार भूपेन ने किया। इस कार्यक्रम में बड़ी तादात में पत्रकार, साहित्यकार, सामाजिक कार्यकर्ता भी मौजूद थे।

जर्नलिस्ट फॉर पीपुल की ओर से जारी

संपर्क
अजय प्रकाश (9910820506)
विश्वदीपक (9910540055)

Tuesday, June 22, 2010

इस व्‍यवस्‍था में तो यही होगा

कांग्रेस ने पहले ही कह दिया था कि भोपाल गैस हादसा और उसके बाद होने वाला सारा घटनाचक्र व्‍यवस्‍‍थागत खामियों का नतीजा था, और हम सारे यानी भोपाल के गैस पीडितों, उनके आंदोलन के समर्थकों से लेकर मीडियाकर्मियों तक यह खुशफहमी पाल बैठे थे कि बिना व्‍यवस्‍था बदले हमें इंसाफ मिल जाएगा,
आखिरकार वही हुआ जो इस व्‍यवस्‍था में होना था, महज 6 फीसदी लोगों को मुआवजे की मरहमपट़टी, लेकिन असल गुनहगार अब भी ठहाके मारकर हंस रहे हैं, चाहे वह अमेरिका में बैठा एंडरसन हो या अपने देश में घूम रहा केशुब महिंद्रा,
आखिर कांग्रेस और मध्‍यप्रदेश की भाजपा सरकार के मंत्री जो मंत्र्ीसमूह में शामिल थे, इस बात पर क्‍यों खामोश रहे कि एंडरसन की निजी संपत्ति कुर्क की जाए, डाउ केमिकल से हर्जाना वसूला जाए, यूनियन कार्बाइड की भारतीय हिस्‍सेदारी खरीदने वाली एवरेडी को भी इस जुर्माने का हिस्‍सा बनाया जाए और केशुब महिंद्रा की कंपनी से भी भारीभरकम जुर्माना वसूल कर यह कडा संकेत दिया जाए कि भविष्‍य में अगर ऐसा कुछ हुआ तो उसके जिम्‍मेदारों को कतई बख्‍शा नहीं जाएगा,
लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ, क्‍योंकि आज भी वही व्‍यवस्‍था है जो 7 दिसंबर 1984 को एंडरसन को गिरफ़तार करने और महज कुछ ही घंटों में गेस्‍टहाउस में रखकर वीआईपी की तरह सरकारी हवाईजहाज से दिल्‍ली के लिए रवाना करने की जिम्‍मेदार थी, केवल नाम और चेहरे बदले हैं व्‍यवस्‍‍था नहीं, यह असलियत भोपाल और देश की जनता जितनी जल्‍दी समझ ले उतना अच्‍छा होगा,
भोपाल गैस कांड से पीडित 5 लाख से अधिक लोग आज केवल कांग्रेस और भाजपा सरकारों को कोस ही सकते हैं, लेकिन कल यही लोग स्‍थानीय नेताओं और उनके ठेकेदारों के बहकावे में आकर एक बार फिर इन्‍हीं पार्टियों को वोट देंगे और इसी व्‍यवस्था को फिर से खडा कर देंगे, आखिर इन्‍हीं लोगों के वोट के दम पर ये नेता भोपाल और दिल्‍ली की कुर्सियों पर बैठे हैं और लाचार वर्तमान तथा खौफजदा भविष्‍य की कीमत पर अपनी राजनीतिक रोटियां सेंक रहे हैं,
देश के दूसरे हिस्‍सों के जो लोग भोपाल की लडाई को यह समझकर देख रहे हैं कि इसका हमसे क्‍या लेनादेना उन्‍हें यह नहीं भूलना चाहिए कि सत्‍ता के ये दलाल एक दिन उन्‍हें ही इसी तरह कीडेमकोडों की तरह तडपकर मरने पर मजबूर कर देंगे और तब उन्‍हें इस लडाई में न शामिल होने का अफसोस होगा,
जब नर्मदा आंदोलन के कार्यकर्ता सरदार सरोवर बांध के विरोध में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटा रहे थे तब कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि यह तय करना कोर्ट का नहीं सरकार का काम है कि देश का विकास किस तरह का होना चाहिए, इस बुनियादी फैसले से तभी समझ जाना चाहिए था कि आम जनता के दुखदर्द और उनके आंसुओं का देश के विकास और पूंजीपतियों की सरकार से कोई लेना देना नहीं है, जब तक जनता जुनून बनकर इस व्‍यव्‍स्‍था को नहीं बदलेगी उसे इसी तरह जुल्‍म और जिल्‍लत बर्दाश्‍त करनी पडेगी, लेकिन याद रखने वाली बात है कि एक दिन स्‍पार्टकस ने भी बगावत कर ही थी, आखिर हम कब तक सहन करेंगे,,,,,