Sunday, May 25, 2008

अब हवा में भी नहीं रहने देंगे पानी

इस पर्यावरण दिवस की सबसे बड़ी खबर यही होनी चाहिए कि अब पानी के लिए बादलों या नगरनिगम के टैंकर अथवा नलों की राह नहीं ताकनी होगी। बाजार ने पानी को पैसों वालों के अंगूठे के नीचे दबाकर रखने की जुगत निकाल ली है। अमेरिका की एयर वाटर कारपोरेशन एटमोस फ्रिक वाटर टेक्नालाजी सिंक कंपनी ने ऐसी मशीन बाजार में उतार दी है जो हवा से नमी सोखकर पानी बनाती है। आप जितना खर्च करने को तैयार होंगे उतना ही पानी इस्तेमाल कर पाएंगे। सवा लाख की मशीन से रोजाना हजार लीटर पीने लायक पानी बनाया जा सकता है। लेकिन कंपनी मध्यम वर्ग को भी इस अनूठे लाभ से वंचित नहीं रखना चाहती, इसलिए उसने 35 हजार कीमत वाली मशीन भी बाजार में उतारने की तैयारी पूरी कर ली है जो रोजाना 250 लीटर पानी बनाएगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि गरीबी रेखा के आसपास रहने वालों के लिए और सस्ती मशीन आएगी क्योंकि सरकारी गति से उन्हें साफ पानी मुहैया कराना इस मशीन से तो सस्ता नहीं ही होगा। वैसे भी सरकार बाजार की जिस कदर वकालत कर रही है उसे देखते हुए इसकी उम्मीद ज्यादा है कि सामान्य लोगों को साफ पेयजल मुहैया कराने की जगह सरकार इस मशीन की कीमत पर सब्सिडी या बैंक से कम ब्याज वाले कर्ज की योजना लागू कर दे।
यह मशीन 55 प्रतिशत से अधिक नमी वाले इलाकों में 19 डिग्री तापमान पर भरपूर पानी बना सकती है। जाहिर है कि लगभग समूचा भारत इस कंपनी के लिए आसान बाजार है। फिलहाल इस मशीन का इस्तेमाल जम्मू और श्रीनगर में फौज कर रही है क्योंकि कई दुर्गम इलाकों में साफ पेजयल मुहैया होना मुश्‍किल है। देश के बाकी हिस्सों में जल्द ही यह मशीन अपना मौजूदगी का अहसास कराएगी इसमें ज्यादा शक-शुबहे की गुंजायश नहीं होनी चाहिए क्योंकि सरकारी मशीनरी आने वाले बरसों में देश की बड़ी आबादी को साफ पेजयल मुहैया करा पाएगी इसमें जरूर शक है। अगर वर्ल्ड बैंक के ही आंकड़ों पर नजर डाली जाए तो पता चलता है कि देश में होनेवाली करीब 21 फीसद बीमारियां साफ पेयजल के अभाव की वजह से होती हैं। हालत यह है कि डायरिया जैसी बीमारी की वजह से रोजाना 1600 मौतें होती हैं। ये संख्या उतनी ही है अगर 200 की सवारी वाले आठ हवाई जहाज रोजाना धरती पर जा गिरें। ऐसे में लोग बीमारियों पर पैसे खर्च करने की जगह यह मशीन खरीद लें तो उन्हें समझदार उपभोक्ता ही मानना चाहिए।
लेकिन अभी कई ऐसे सवाल हैं जिनपर इस मशीन के निर्माताओं और देश में इन्हें बेचनेवालों से जवाब मांगा जाना चाहिए। मसलन अभी तक हमारे देश में जमीन के उपर और जमीन के नीचे के पानी के अलावा पानी के अन्य उपयोग पर नियंत्रण रखने संबंधी कोई कानून नहीं है। याद रखने वाली बात है कि ये मशीनें ना तो किसी कुंए, तालाब या नदी से पानी खींचेंगी ना ही गहरे टयूबवेल खोंदेंगी जिनपर मौजूदा सरकारी कानूनों के जरिए रोक लगाई जा सके या नियंत्रण किया जा सके। ये मशीनें हवा से नमी सोखकर पानी बनाएंगी जिसपर नियंत्रण करने या उसे मापने का कोई पैमाना अभी तक नहीं है। देश में जल संकट की स्थिति गंभीर है। ऐसे में अमेरिका से आयातित पानी बनाने वाली मशीनें जल संकट के निदान में मदद करेंगी या जल संकट को नया आयाम देंगी यह जरूर चिंतनीय विषय है।
सच यही है कि आने वाले सालों में देश में पानी का संकट भयावह होने जा रहा है। भारत में चेरापूंजी के 11000 मिमी से जैसलमेर के 200 मिमी की बारिश के बीच देश की औसत सालाना बारिश 1170 मिमी है। इस नजरिए से दुनिया के सर्वाधिक जलसंपदा वाले देशों में से एक हमारे देश के कई राज्य रेगिस्तान बन चुके हैं और कई बनने की कगार पर हैं। 1955 में प्रति व्यक्ति 5277 घन मीटर पानी की उपलब्धता 2001 में गिरकर 1820 घन मीटर तक पहुंच चुकी है। आशंका है कि 2025 तक यह 1000 घन मीटर तक घटेगी। अनुमान है कि सन 2050 में भारत की आबादी के 1450 अरब लोगों में से करीब 8 अरब लोग शहरों में होंगे और यह शहरों की मौजूदा आबादी पर जबदस्त बोझ होगा। उस वक्त ग्रामीण क्षेत्रों में पानी की उपलब्धता प्रति व्यक्ति प्रति दिन 40 लीटर तक घट जाएगी, शहर अपनी आबादी की जलापूर्ति कैसे करेंगे यह विचारणीय प्र6न है। खासकर यह देखते हुए कि देश की राजधानी दिल्ली तक को वर्तमान आबादी की पानी की जरूरत पूरी करने के लिए दूसरे राज्यों के रहमोकरम पर निर्भर रहना पड़ रहा है। तमिलनाडु और कनार्टक के बीच पानी के बंटवारे को लेकर लड़ाई जारी है, राजस्थान में बीसलपुर बांध के पानी को कई छोटे कस्बों की उपेक्षा कर जयपुर पहुंचाना हिंसक रूप ले चुका है। देश के कई बड़े शहर मसलन बंगलूर, चेन्नई को कम से कम 200 किमी दूर से पेयजल मंगाना पड़ रहा है। सरकार ने इसका एक समाधान पानी के लिए ज्यादा पैसे वसूलने में ढूंढा है। फिलहाल सरकार पानी पर दी जा रही सब्सिडी के तौर पर सालाना करीब 50 अरब रुपयों का नुकसान उठाने का दावा कर रही है। सरकार का तर्क यह है कि कम कीमत में पानी मुहैया कराने पर उसकी बरबादी ज्यादा होती है। शहरों में यह बरबादी कुल पानी के 30 फीसद के बराबर आंकी गई है।
अगर हम पानी के इस्तेमाल की देश में पानी की मौजूदगी से तुलना करें तो हैरत में पड़ जाएंगे। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक 2010 तक हम करीब 230 बिलियन क्यूबिक मीटर भूजल का इस्तेमाल कर चुके होंगे, लेकिन ताजा आंकड़े बताते हैं हम अब तक 250 बिलियन क्यूबिक मीटर पानी का इस्तेमाल कर चुके हैं। जाहिर है कि हम पानी का बैंक इतनी तेज गति से खाली कर रहे हैं कि उसे भरने की तमाम सरकारी, गैर सरकारी कोशिशें नाकाम साबित होंगी। इस संदर्भ में राष्‍ट्रीय सैंपल सर्वे संस्थान के उस सर्वेक्षण का हवाला उपयोगी है जिसमें कहा गया है कि 82 फीसद गांवों में घरेलू उपयोग के लिए भूजल इस्तेमाल होता है। इस पर रोक लगाने के दूरगामी असर होंगे। हाल में राजस्थान, महाराष्‍ट्र, ओड़ीसा तथा हिमाचल प्रदेश में ग्रामीणों को भूजल का इस्तेमाल न करने के कानून बन चुके हैं। हाल में अंतरराष्‍ट्रीय जल प्रबंधन इंस्ट्टियूट द्वारा किए इंदौर, नागपुर, बंगलूर, जयपुर, अहमदाबाद तथा चेन्नई शहरों के सर्वेक्षण से पता चला है कि इनमें शहर की नागरिक व निगम की जल जरूरतों की 72 से 99 फीसद पूर्ति भूजल से ही होती है। इन शहरों में टैंकर से पानी आपूर्ति करने पर होने वाली सालाना आमदनी करीब 100 करोड़ रुपयों की है। संभवत: ऐसे ही आंकड़े देखकर अमेरिकी कंपनी ने हवा से पानी बनाने वाली मशीन के बारे में सोचा हो।
यूं भी ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल मुहैया कराने के सरकारी आंकड़ों में काफी गफलत है। पेयजल आपूर्ति विभाग एक तरफ तो यह कहता है कि 2004 तक देश के 94 फीसदी ग्रामीण इलाकों में पेयजल आपूर्ति सुचारू ढंग से हो रही है, वहीं दसवीं पंचव8र्ाीय योजना में वे अपना बजट वर्तमान 167 बिलियन से बढ़ाकर 404 बिलियन करने की मांग कर रहे हैं। सोचने वाली बात है कि महज 6 फीसदी ग्रामीण इलाकों को पेयजल देने के लिए 404 बिलियन रुपयों की आखिर क्या जरूरत है। इसी तरह शहरी आबादी के लिए 95 फीसद को पेयजल आपूर्ति करने के दावे के बाद 10वीं पंचवर्षीय योजना में 282 बिलियन रुपयों की मांग कई सवाल खड़े करती है। यूं भी वर्ष 2015 तक देश की 334 क़रोड़ लोग साफ पेयजल से वंचित रहेंगे। इनमें 244 क़रोड़ ग्रामीण आबादी होगी जबकि 9 करोड़ शहरियों को साफ पेयजल नहीं मिल पाएगा। अभी का हाल यह है कि दिल्ली की 13 फीसदी आबादी को रोजाना पानी की आपूर्ति नहीं हो पाती, जबकि मध्यप्रदेश के 40 फीसद घरो को रोजाना 40 लीटर साफ पानी भी नहीं मिल पाता। जाहिर है कि इन हालात में पानी बनाने वाली मशीन को देश की आबादी हाथों हाथ लेगी और कंपनी को अरबों-खरबों का मुनाफा देगी। लेकिन सवाल यह है कि जब जमीन के अंदर से पानी खत्म होने का खतरा इस कदर बढ़ गया है कि उसपर रोक लगाने की तमाम कवायदें जारी है, ऐसे में हवा में मौजूद नमी को निजी कंपनियों के हवाले करने के दूरगामी नतीजे क्या होंगे। क्या देश में बड़े पैमाने पर इस मशीन के इस्तेमाल से पर्यावरण में मौजूद नमी के खत्म होने की आंशका नहीं पैदा होगी, कहीं इसका नतीजा बारिश के घटने के रूप में तो देखने को नहीं मिलेगा। ऐसे कई सवाल हैं जिनका जवाब मिले बिना ऐसी मशीनों के खुलेआम इस्तेमाल की इजाजत नहीं दी जानी चाहिए। लेकिन भारत सरकार की जल नीति में जल प्रबंधन व आपूर्ति के लिए निजी क्षेत्र को जिस तरह बढ़ावा दिया जा रहा है उसे देखते हुए ऐसी किसी पाबंदी की उम्मीद कम ही की जानी चाहिए।

1 comment:

asma said...

Aman ji,
Very good.
Really glad to see you on issues after centuries. PAANI has become your identity.Articles are good but you need to be more careful in proofs, such as KAROR has written with a bindi under KA. And your blogs name would be written JAZBAT as I pronounce it.Baqi

All the best

Asma