Monday, June 23, 2008

पहले अस्मिता बन तो जाए


गुजरात की वेबसाइट http://gujaratindia.com/ पर जाइए, पांच करोड़ गुजरातियों के सम्मान के प्रतीक पुरुष मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी इस 'बिजनेट स्टेट' में आपका स्वागत करते मिलेंगे। सचमुच गुजरात आजकल बिजनेस में पूरी तरह लिप्त हो चुका है। यह व्यापार गुजरात की रगों में इस कदर दौड़ रहा है कि इसके मुनाफे को आंच न लगने देने के लिए राज्य के तमाम धृतराष्‍ट़ों ने अपनी आंखें बंद कर ली हैं। मामला चाहे गोधरा हादसे के बाद 800 मुसलमानों को बर्बरतापूवेक मार डालने का हो या फिर सरदार सरोवर बांध की ऊंचाई बढ़ाने से पहले विस्थापितों को बसाने के बारे में आमिर खान की प्रतिक्रिया पर गुजरात के राजनीतिक दलों द्वारा उनके खिलाफ की गई बयानबाजी नतीजे में उनकी फिल्म फना को राज्य में न दिखाए जाने की शूरवीरता हो अथवा अखबार के संपादक, रिपोर्टर के खिलाफ देशद्रोह के मुकदमे की बात हो, इन धृतराष्‍ट़ों ने आधुनिक महाभारत में न तो अपनी आंखें खोलीं और न ही जुबान।


सीधे सीधे मुद्दे पर आते हैं। अहमदाबाद से प्रकाशित अखबार टाइम्स आफ इंडिया के स्थानीय संपादक व रिपोर्टर के खिलाफ देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर लिया गया है क्योंकि राज्य के पुलिस महानिदेशक महोदय को इस बात पर ऐतराज था कि उनके कथित अंडरवर्ल्ड रिश्‍तों पर अखबार लगातार खबरें छापता जा रहा था। हालांकि इस मामले में अब एडीटर्स गिल्ड समेत देश भर के पत्रकारों के जबर्दस्त विरोध के बाद मामला कुछ शांत पड़ता नजर आ रहा है, लेकिन सच तो यह है कि गुजरात में असहिष्‍णुता की ऐसी घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं। पिछले साल भारतीय जनता युवा मोर्चा के सदस्यों ने राज्य के सिनेमाघरों में आमिर खान की फिल्म फना का प्रदर्शन नहीं होने देने के लिए मोर्चा बांधा था। कश्‍मीर के एक आतंकवादी के एक अंधी लड़की के प्रेम में पड़ने की यह फिल्म न तो उन्होंने देखी और न ही उनका इस फिल्म के गीत, संगीत, कहानी, निर्देशन या डायलागों से कोई विरोध था। यह तमाम कवायद केवल इसलिए क्योंकि इस फिल्म में आमिर खान थे। और आमिर खान में कुछ वक्त पहले दिल्ली में चल रहे नर्मदा बचाओ आंदोलन के धरने में शिरकत कर यह कहा कि वे नर्मदा बांध के विस्थापितों के दुख दर्द में शामिल हैं और उनका मानना है कि बिना उनके बेहतर आवास, पुनर्वास की व्यवस्था किए बांध की ऊंचाई नहीं बढ़ानी चाहिए। इस बयान से गुजरात के भाजपाइयों को मानों करंट लग गया हो, माननीय मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा यह पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता के खिलाफ दिया गया बयान है। क्या नरेंद्र मोदी यह कहना चाहते थे कि पांच करोड़ गुजराती मध्यप्रदेश के कोई पौने दो लाख बांध प्रभावितों की कीमत पर पानी लेकर रहेंगे। क्या गुजरात के निवासी अपनी सुविधाओं के लिए दूसरों को जीने के हक तक से वंचित करने को तैयार हैं; निश्वित ही गांधी, पटेल, मोरारजी देसाई, नरहरि अमीन और अब 'बिजनेस स्टेट' के दौर में धीरूभाई अंबानी के गुजरात में कोई भी गुजराती यह मानने को तैयार नहीं होगा कि वे दूसरों के दुखों से अपने लिए सुख खरीदेंगे। फिर यह फना के प्रदर्शन और अभिव्‍यक्ति के अधिकार पर यह अंकुश क्यों।

सुप्रीम कोर्ट और प्रधानमंत्री ने सरदार सरोवर की ऊंचाई न तो आमिर खान के कहने पर रोकी और न ही नर्मदा बचाओ आंदोलन की नेता मेधा पाटकर के 20 दिन लंबे उपवास का उनपर कोई असर पड़ा। उसके बावजूद आमिर खान के बयान में आखिर ऐसा क्या था कि गुजरात में बवंडर खड़ा हो गया। क्या गुजरात भारतीय जनता युवा मोर्चा का बंधक बन गया। गुजरात के सिनेमाघरों के मालिकों का कहना था कि उनका आमिर खान के बयान से उतना लेना देना नहीं है जितना इस आशंका से कि अगर उन्होंने यह फिल्म राज्य के सिनेमाघरों में दिखाई तो जबर्दस्त तोड़फोड़ की जाएगी और उनका नुकसान होगा। क्या पांच करोड़ गुजरातियों की अस्मिता के प्रवक्ता नरेंद्र मोदी के लिए यह चिंता का विशय नहीं है कि देश विदेश से भारी निवेश कर रहे उनके राज्य में मनोरंजन उद्योग की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है। कल को यही स्थिति दूसरे उद्योगों की नहीं होगी, इस बात की आखिर वे क्या गारंटी दे सकते हैं। देश के विकसित राज्यों की सूची में अव्वल स्थानों पर रहने वाले गुजरात के पांच करोड़ लोगों का दिल आखिर उन आदिवासियों, गरीबों के लिए क्यों नहीं पिघलता जो गुजरात के विकास की कीमत अपनी जमीन, संस्कृति और परंपरा से चुका रहे हैं। हर किसी को खुद के लिए अर्जित की गई वस्तु की कीमत चुकानी पड़ती है। गुजरात के पांच करोड़ लोग अपने विकास की क्या कीमत चुका रहे हैं?

यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी सरदार सरोवर को देश के सवा अरब लोगों के लिए नहीं गुजरात के पांच करोड़ लोगों की अस्मिता का प्रतीक बताते हैं। अगर वे गुजरात को देश का अभिन्न हिस्सा मानते तो मध्यप्रदेश के डूब प्रभावितों की डूबती किस्मत को गुजरात के पांच करोड़ लोगों की अस्मिता पर कुर्बान न करते। अगर वे देश को गुजरात से ऊपर मानते तो आमिर खान की फिल्म का सबसे ज्यादा स्वागत गुजरात में करवाते। लेकिन अफसोस है कि बिजनेट स्टेट बनने की दौड़ में गुजरात मानवता, सौहार्दय, भाईचारा और सदाषयता जैसे जीवन मूल्यों को पीछे छोड़ता जा रहा है। हद तो यह है कि वे केंद्र को हाल ही में यह चुनौती भी दे बैठे कि गुजरात को उनसे किसी तरह की आर्थिक मदद नहीं चाहिए, बशर्ते केंद्र गुजरात से साल भर तक किसी तरह का टैक्स ना ले। अगर केद्र-राज्य संबंधों की इस मोदी व्याख्या को थोड़ी और ढील दी जाए तो कश्‍मीर, मणिपुर, मिजोरम सरीखे उत्‍तरपूर्वी राज्यों में चल रहे अलगाववादियों के बयान और मोदी के बयान में ज्यादा मूलभूत अंतर नजर नहीं आएगा। लेकिन जरूरी नहीं है कि गुजरात के पांच करोड़ लोग ऐसे ही विचारों के हों। बहुत संभव है कि अभी भी बहुमत उनका हो जो गांधी, पटेल, मोरारजी या नरहरि अमीन के नाम पर आंखें न मूंद लेते हों, जरूरत है उनके मुखर होने की। वरना जो मुखर हो रहे हैं वही गुजरात के बारे में देश और दुनिया में यह संदेश देंगे कि गुजरात की संस्कृति अब बर्बर होती जा रही है, गुजरात अपने विरोध में कहा गया एक भी शब्द बर्दाश्‍त नहीं कर सकता, गुजरात दूसरों के विनाश की कीमत पर अपना विकास करने में कोई अपराधबोध नहीं महसूस करता, आदि आदि। क्या गुजरात की जनता इस अपमान को सहने के लिए तैयार है। निश्वित ही फैसला गुजरात की जनता को करना चाहिए कि वह लोकतंत्र में कुछ खास दलों की बंधक बनकर रहेगी या हिम्मत के साथ अपने विचारों के साथ आगे आकर कहेगी कि गुजरात की अस्मिता देश की अस्मिता में है और देश की अस्मिता इसमें है कि गुजरात सहित पूरे देष में अभिव्यक्ति की आजादी बनी रहे, विकास की प्रक्रिया न्यायपूर्ण और सहभागिता पर आधारित हो। ऐसा न होने की हालत में गुजरात और जम्मू कश्‍मीर के अलगाववादियों में कोई फर्क नहीं रह जाएगा जो अपने सम्मान और जिद के लिए भारत की इज्जत नहीं करते। और गुजरात के धृतराष्‍ट़ों को भी महाभारत में कौरवों की नियति भूलनी नहीं चाहिए।

2 comments:

संजय बेंगाणी said...

गुजरात मूर्ख लोगो का प्रदेश है.

prabhat said...

It is good that you are revealing such matters before the readers. But dont you think that you people seem to be biased. Take all the things in to consideration and then try to write something. I would like to say that being a leftist or rightist is not everything in this life.

So be a human being and analyse the situatins.